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अध्याय-4: कृषि
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की लगभग दो-तिहाई आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि (Agriculture) पर निर्भर है। यह अध्याय हमें कृषि के प्रकारों (निर्वाह, वाणिज्यिक, रोपण), भारत की प्रमुख शस्य ऋतुओं (रबी, खरीफ, जायद) और देश में उगाई जाने वाली प्रमुख खाद्य और अखाद्य फसलों के बारे में जानकारी देता है। साथ ही हम किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों और सरकार द्वारा किए गए कृषि सुधारों (जैसे हरित क्रांति) का भी अध्ययन करेंगे।
- कृषि प्रणालियाँ: प्रारंभिक जीविका निर्वाह (झूम खेती), गहन निर्वाह और वाणिज्यिक कृषि।
- भारत की फसल ऋतुएँ: रबी, खरीफ और जायद फसलों के बुवाई और कटाई का समय।
- प्रमुख फसलें: खाद्य (चावल, गेहूँ, दालें), नकदी (गन्ना, चाय, कॉफी) और अखाद्य (कपास, जूट, रबड़) फसलों की भौगोलिक आवश्यकताएँ।
- कृषि सुधार और चुनौतियाँ: हरित क्रांति के लाभ-हानि, सरकारी नीतियाँ और भूमंडलीकरण (Globalization) का भारतीय किसानों पर प्रभाव।
- विभिन्न प्रकार की कृषि प्रणालियाँ और उनकी विशेषताएँ।
- चावल और गेहूँ जैसी प्रमुख फसलों के लिए आवश्यक तापमान, वर्षा और मिट्टी।
- हरित क्रांति और श्वेत क्रांति क्या हैं?
- भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व।
- घटते खाद्य उत्पादन और किसानों की आत्महत्या/पलायन के मुख्य कारण।
- किसानों के हित में सरकार द्वारा उठाए गए संस्थागत और तकनीकी कदम (जैसे फसल बीमा, किसान कार्ड)।
कृषिः-
कृषि एक प्राथमिक क्रिया है जो हमारे लिए अधिकांश खाद्यान्न उत्पन्न करती है। खाद्यान्नों के अतिरिक्त यह विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चा माल भी पैदा करती है। इसके अतिरक्ति, कुछ उत्पादों जैसे चाय, कॉफी, मसाले इत्यादि का भी निर्यात किया जाता है।
कृषि प्रक्रियाः-
- जुताई (खेत जोतना, मिट्टी को भुरभुरा करना)
- बुवाई (बीज बोना)
- निराई (खरपतवार निकालना)
- सिंचाई (पानी डालना)
- खाद (खाद या उवर्रक डालना)
- कीटनाशक (कीड़े मारने वाली दवाई छिड़कना)
- कटाई (फसल पकने पर काटना)
- दलाई / गहराई (बालियों मे से बीज अलग करना)
कृषि प्रणाली:-
- निर्वाह कृषि
- गहन कृषि
- वाणिज्यिक कृषि
- रोपण कृषि
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषिः-
इस तरह की खेती जमीन के छोटे टुकड़ों पर होती है। इस तरह की खेती में आदिम औजार और परिवार या समुदाय के श्रम का इस्तेमाल किया जाता है। यह खेती मुख्य रूप से मानसून पर और जमीन की प्राकृतिक उर्वरता पर निर्भर करती है। किसी विशेष स्थान की जलवायु को देखते हुए ही किसी फसल का चुनाव किया जाता है।
कर्तन दहन प्रणाली / स्थानांतरित कृषिः-
किसान जंगल की भूमि के टुकड़े को साफ करके अर्थात् पेड़ काटकर जलाते है, परिवार के जीविका निर्वाह के लिए खेती करते हैं और उस जमीन की उर्वरता कम होने के बाद किसी और जमीन के टुकड़े को साफ करके खेती करते हैं।
गहन निर्वाह कृषिः-
गहन निर्वाह कृषि में किसान एक छोटे भूखंड पर साधारण औज़ारों और अधिक श्रम से खेती करता है। अधिक धूप वाले दिनों से युक्त जलवायु और उर्वर मृदा वाले खेत में, एक वर्ष में एक से अधिक फ़सलें उगाई जा सकती हैं। चावल मुख्य फ़सल होती है। अन्य फ़सलों में गेहूँ, मक्का, दलहन और तिलहन शामिल हैं।
वाणिज्यिक कृषिः-
- इस प्रकार की कृषि के मुख्य लक्षण आधुनिक निवेशों जैसे अधिक पैदावार देने वाले बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से उच्च पैदावार प्राप्त करना है।
- कृषि के वाणिज्यीकरण का स्तर विभिन्न प्रदेशों में अलग- अलग है। उदाहरण के लिए हरियाणा और पंजाब में चावल वाणिज्य की एक फसल है परंतु ओडिशा में यह एक जीविका फसल है।
रोपण कृषिः-
एक प्रकार की वाणिज्यिक कृषि है जिसमें विस्तृत क्षेत्र में एकल फसल बोई जाती है। जिसमें अत्यधिक पूंजी निवेश व श्रम का प्रयोग होता है। भारत में चाय, कॉफ़ी, रबड़, गन्ना, केला इत्यादि मुख्य रोपण फसलें हैं।
गहन निर्वाह खेती और वाणिज्यिक खेती के बीच अंतरः-
| प्रारम्भिक जीविका निर्वाह कृषि | वाणिज्यिक कृषि |
|---|---|
| छोटी भूमि जोत और सीमित भूमि | बड़ी भूमि जोत |
| पारंपरिक तकनीक और उपकरण उदाहरणः - कुदाल, डाओ, खुदाई करने वाली छड़ी। | आधुनिक तकनीक और उपकरण |
| स्थानीय बाजार के लिए उत्पादन | निर्यात के लिए उत्पादन। |
| एक वर्ष में दो या तीन फसलें | एक ही फसल पर ध्यान |
| मुख्य रूप से आजीविका और खाद्य फसलों का उत्पादन, उदाहरण:- धान, गेहूं | मुख्य रूप से व्यापार के लिए चिंता उदाहरण:- गन्ना चाय, कॉफी |
कृषि ऋतुएं:-
भारत में तीन शस्य ऋतुएँ हैं, जो इस प्रकार हैं:-
- रबी
- खरीफ
- जायद
रबी फसलें:-
रबी फसलें शीतऋतु में अक्टूबर से दिसबंर के मध्य में बोई जाती हैं और ग्रीष्म ऋतु में अप्रैल से जून के मध्य काट ली जाती हैं। गेहूँ, जौ, मटर, चना और सरसों आदि मुख्य रबी फसलें हैं।
खरीफ फसलें:-
- खरीफ फसलें देश के विभिन्न क्षेत्रों में मानसून के आगमन के साथ जून - जुलाई में बोई जाती हैं और सितंबर अक्टूबर में काट ली जाती हैं।
- खरीफ ऋतु की मुख्य फसलें चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर, मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूँगफली और सोयाबीन हैं।
जायदः -
रबी और खरीफ फसल ऋतुओं के बीच ग्रीष्म ऋतु में बोई जाने वाली फसल को जायद कहा जाता है। जायद ऋतु में मुख्यत तरबूज, खरबूजे, खीरे, सब्जियों और चारे की फसलों की खेती की जाती है। गन्ने की फसल को तैयार होने में लगभग एक वर्ष लगता है।
कृषि की मुख्य फसलें:-
- खाद्य फसलें:- गेहूं, चावल, मक्का, दलहन, तिलहन
- नकदी फसलें:- चाय, कॉफी, रबड़, जूट, कपास
- बागवानी फसलें:- फल, फूल, सब्जियां
भारत में मुख्य फसलें:-
भारत में मुख्य रूप से चावल, गेहूँ, मोटे अनाज, दालें (दलहन), चाय, कॉफी, गन्ना, तिलहन, कपास, जूट इत्यादि फसलें उगाई जाती हैं।
1. चावलः-
चावल भारत के अधिकांश लोगों की मुख्य फसल है। हमारा देश दुनिया में चीन के बाद चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
- जलवायुः- धान एक उष्णकटिबंधीय फसल है और गीले मानसून में अच्छी तरह से बढ़ता है।
- तापमानः - तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर, भारी आर्द्रता अपेक्षित।
- वर्षा:- 100 सेमी. से ऊपर। इसे गर्मियों में भारी वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता होती है।
- खेती के क्षेत्रः- उत्तर और उत्तर पूर्वी भारत के मैदान, तटीय क्षेत्र और डेल्टा क्षेत्र। सिंचाई की मदद से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्से।
2. गेहूं:-
गेहूं दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल है। यह उत्तर में और देश के उत्तर पश्चिमी भाग में मुख्य खाद्य फसल हैं।
- मृदा प्रकार:- जलोढ़ मिट्टी और काली मिट्टी।
- तापमानः - वृद्धि के समय ठंडा मौसम तथा कटाई के समय तेज धूप।
- वर्षा:- 50 से 75 से.मी. वार्षिक वर्षा
- खेती के क्षेत्रः- दक्कन के उत्तर पश्चिम और काली मिट्टी के क्षेत्र में गंगा सतलुज का मैदान।
- गेंहू उत्पादक राज्यः- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान हैं।
3. मोटे अनाज:-
- ज्वार, बाजरा और रागी भारत में उगाए जाने वाले महत्वपूर्ण मोटे अनाज हैं। हालांकि, इनको अनाज के रूप में जाना जाता हैं। किन्तु इनमें पोषक तत्वों की मात्रा बहुत अधिक है।
- ज्वार, क्षेत्र और उत्पादन के संबंध में तीसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल है।
बाजराः-
- मृदा प्रकारः- यह बलुआ और उथली काली मिट्टी पर उगाया जाता है।
- बाजरा उत्पादक राज्यः- राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा इसके मुख्य उत्पादक राज्य हैं।
रागी:-
- मृदा प्रकारः- रागी शुष्क प्रदेशों की फसल है और यह लाल, काली, बलुआ, दोमट और उथली काली मिट्टी पर अच्छी तरह उगायी जाती है।
- रागी उत्पादक राज्यः- रागी के प्रमुख उत्पादक राज्य कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, सिक्किम, झारखंड और अरुणाचल प्रदेश हैं।
4. मक्का:-
मक्का एक ऐसी फसल है जिसका उपयोग भोजन ओर चारे दोनों के रूप में किया जाता है। यह एक खरीफ फसल है।
- तापमान:- जो 21° सेल्सियस से 27° सेल्सियस तापमान में उगाई जाती है।
- मृदा प्रकारः- पुरानी जलोढ़ मिट्टी पर अच्छी प्रकार से उगायी जाती है।
- खेती के क्षेत्र:- बिहार जैसे कुछ राज्यों में मक्का रबी की ऋतु में भी उगाई जाती है।
- मक्का उत्पादक राज्यः कर्नाटक, मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना मक्का के मुख्य उत्पादक राज्य हैं।
आधुनिक प्रौद्योगिक निवेशों जैसे उच्च पैदावार देने वाले बीजों, उर्वरकों और सिंचाई के उपयोग से मक्का का उत्पादन बढ़ा है।
5. दालें:-
- भारत विश्व में दाल का सबसे बड़ा उत्पादक होने के साथ साथ सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है।
- शाकाहारी खाने में दालें सबसे अधिक प्रोटीन दायक होती हैं। तुर (अरहर), उड़द, मूँग, मसूर, मटर और चना भारत की मुख्य दलहनी फसले हैं।
- दालों को कम नमी की आवश्यकता होती है और इन्हें शुष्क परिस्थितियों में भी उगाया जा सकता है। फलीदार फसलें होने के नाते अरहर को छोड़कर अन्य सभी दालें वायु से नाइट्रोजन लेकर भूमि की उर्वरता को बनाए रखती हैं। अतः इन फसलों को आमतौर पर अन्य फसलों के आवर्तन (rotating) में बोया जाता है।
दाल उत्पादक राज्यः- भारत में मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, और कर्नाटक दाल के मुख्य उत्पादक राज्य हैं।
खाद्यान्नों के अलावा अन्य खाद्य फसलें
1. गन्नाः-
ब्राजील के बाद भारत गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
- जलवायुः - यह गर्म और आर्द्र जलवायु में अच्छी तरह से बढ़ता है।
- मृदा प्रकारः - यह विभिन्न प्रकार की मिट्टी पर अच्छी तरह से उगाया जा सकता है।
- तापमानः - तापमान की आवश्यकता 21°C से 27°C होती हैं।
- वर्षा:- 75 सेमी और 100 सेमी के बीच वार्षिक वर्षा।
- प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यः- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु हैं।
2. तिलहन:-
- भारत तिलहन का सबसे बड़ा उत्पादक है। मूंगफली, सरसों, नारियल, तिल, सोयाबीन, अरंडी, बिनौला, अलसी और सूरजमुखी भारत के मुख्य तिलहन हैं।
- दुनिया में मूंगफली का उत्पादन चीन (प्रथम), भारत (दूसरा) और रेपसीड उत्पादन में कनाडा, प्रथम, चीन, दूसरा और भारत दुनिया में तीसरा ।
3. चायः -
दुनिया में चाय उत्पादन में 2020 में चीन प्रथम और भारत दूसरा।
- जलवायुः - उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय (गर्म और आर्द्र) जलवायु में अच्छी तरह से विकसित होती हैं।
- मृदा प्रकारः- गहरी उपजाऊ अच्छी तरह से सूखी मिट्टी जो ह्ययूमस और कार्बनिक पदार्थों में समृद्ध हैं।
- वर्षा:- 150 से 300 सेमी वार्षिक। उच्च आर्द्रता और लगाकर वर्षा पूरे वर्ष समान रूप से वितरित हो।
- प्रमुख चाय उत्पादक राज्यः- असम और पश्चिम बंगाल ।
4. कॉफी:-
चाय की तरह कॉफी को भी बागानों में उगाया जाता है। भारत में सबसे पहले यमन से अरेबिका किस्म की कॉफी को उगाया गया था। शुरुआत में कॉफी को बाबा बूदन पहाड़ियों में उगाया गया था।
बागवानी फसलें:-
- सन् 2017 में भारत का विश्व में फलों और सब्जियों के उत्पादन में चीन के बाद दूसरा स्थान था। भारत उष्ण और शीतोष्ण कटिबंधीय दोनों ही प्रकार के फलों का उत्पादक है।
- भारत का मटर फूलगोभी, प्याज, बंदगोभी, टमाटर, बैंगन और आलू उत्पादन में प्रमुख स्थान है।
अखाद्य फसलें
1. रबड़:-
रबड़ भूमध्यरेखीय क्षेत्र की फसल है परंतु विशेष परिस्थितियों में उष्ण और उपोष्ण क्षेत्रों में भी उगाई जाती है। रबड़ एक महत्त्वपूर्ण कच्चा माल है जो उद्योगों में प्रयुक्त होता है।
- वर्षाः - इसको 200 सेमी. से अधिक वर्षा और 25° सेल्सियस से अधिक तापमान वाली नम और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है।
- रबड़ उत्पादक राज्यः- इसे मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, अंडमान निकोबार द्वीप समूह और मेघालय में गारो पहाड़ियों में उगाया जाता है।
2. कपास:-
भारत को कपास के पौधे का मूल स्थान माना जाता है। सूती कपड़ा उद्योग में कपास एक मुख्य कच्चा माल है। कपास उत्पादन में भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है (2017)।
- मृदा प्रकारः- दक्कन पठार के शुष्कतर भागों में काली मिट्टी कपास उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
- तापमानः - इस फसल को उगाने के लिए उच्च तापमान, हल्की वर्षा या सिंचाई, 210 पाला रहित दिन और खिली धूप की आवश्यकता होती है।
- गेंहू उत्पादक राज्यः- महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश कपास के मुख्य उत्पादक राज्य हैं।
- यह खरीफ की फसल है और इसे पककर तैयार होने में 6 से 8 महीने लगते हैं।
3. जूटः-
- जूट के लिए अच्छी जल निकासी वाली बाढ़ के मैदानों की उपजाऊ मिट्टी की जरूरत होती है।
- जूट के मुख्य उत्पादक हैं पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, उड़ीसा और मेघालय।
शस्यावर्तनः-
भूमि की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए भूमि के किसी टुकड़े पर फसलें बदल बदल कर बोना।
चकबंदी:-
बिखरी हुई कृषि जोतों अथवा खेतों को एक साथ मिलाकर आर्थिक रूप से लाभ प्रद बनाना।
हरित क्रांतिः-
कृषि क्षेत्र में अधिक उपज वाले बीजों का प्रयोग, आधुनिक तकनीक, अच्छी खाद / उर्वरकों का प्रयोग करने से कुछ फसलों विशेषकर गेहूँ के उत्पादन में क्रांतिकारी वृद्धि को हरित क्रांति कहते हैं।
हरित क्रांति की हानियाँ:-
- अत्यधिक रसायनों के कारण भूमि का निम्नीकरण।
- सिंचाई की अधिकता से जल स्तर नीचा।
- जैव विविधता समाप्त हो रही है।
- अमीर और गरीब किसानों के मध्य अंतर बढ़ गया है।
श्वेत क्रांतिः-
दूध के उत्पादन में वृद्धि के लिए पशुओं की नस्लों को सुधारना (आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करके)।
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वः-
- भारत कृषि प्रधान देश है।
- लगभग दो – तिहाई आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर सीधे निर्भर करती है।
- कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य भाग है।
- यह सकल घरेलू उत्पाद का 26% है।
- यह देश के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है और उद्योगों के लिए कई कच्चे माल का उत्पादन करता है।
भारतीय कृषि की विशेषताएं:-
- किसानों के पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा होता है और मुख्य रूप से अपने स्वयं के उपभोग के लिए फसलें उगाते हैं।
- विभिन्न प्रकार की कृषि गतिविधियों में पशु महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- किसान मुख्य रूप से मानसून की बारिश पर निर्भर रहते हैं।
भारतीय कृषि पर भूमंडलीय के प्रभावः-
- भारतीय किसानों को इन उत्पादों के लिए अस्थिर कीमतों के लिए मजबूर होना पड़ सकता हैं, जिसमें साल दर साल बड़े पैमान पर उतार चढ़ाव आते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर और घरेलू स्तर पर कृषि उत्पादों की कीमतों पर व्यापार उदारीकरण का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है। कि अन्य देश किन नीतियों का पालन करते हैं।
- प्रमुख कृषि वस्तुओं के निर्यात को उदार बनाया गया है।
- फसलों की उच्च उपज देने वाली किस्मो की शुरूआत के साथ बड़ा परिवर्तन हुआ।
- इस नवाचार, बुनियादी ढांचे में निवेश, क्रेडिट विपणन और प्रसंस्करण सुविधाओं के विस्तार के साथ आधुनिक आदानों के उपयोग में उल्लेखित वृद्धि हुई।
भारत में घटते खाद्य उत्पादन के लिए उत्तरदायी कारण:-
- गैर कृषि उपयोग के साथ प्रतिस्पर्धा के कारण बोए गए क्षेत्र में कमी।
- रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के अधिक उपयोग के कारण उपजाऊ क्षमता में कमी।
- असक्षम तथा अनुचित जल प्रबंधन ने जलाक्रांतता और लवणता की समस्या को उत्पन्न किया।
- अत्यधिक भू - जल दोहन के कारण भौम जल स्तर गिर गया है, इससे कृषि लागत में वृद्धि।
- अपर्याप्त भंडारण क्षमता तथा बाज़ार का अभाव।
भारत में किसानों के सामने चुनोतियाँ:-
- मानसून की अनिश्चितता।
- गरीबी और ऋण का दुश्चक्र।
- शहरों की ओर पलायन।
- सरकारी सुविधाओं तक पहुँच में कठिनाई और बिचौलिए।
- अर्न्तराष्ट्रीय प्रतियोगिता।
भारत में कृषिगत सुधारों के उपायः-
- अच्छी सिंचाई व्यवस्था, जैविक खाद, आधुनिक कृषि यंत्रों आदि का उपयोग।
- किसानों की प्रत्यक्ष सहायता, बैंक खाते में सहायता रकम का सीधा पहुंचना।
- सरकारी सहायता, सस्ते ऋण।
- बिजली पानी की सुलभता।
- बाजारों तक सुगमता।
- बाढ़, सूखे, चक्रवात, आग, कीट आदि से बचाव के लिए फसल बीमा।
- न्यूनतम समर्थन मूल्य, ग्रामीण बैंक, किसान कार्ड आदि।
- कृषि संबधी शिक्षा, मौसम संबंधी जानकारी देना।
- राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय कृषि सेमिनारों का आयोजन और आम किसान की पहुँच उन तक होना।
- कृषि विद्यालय, विश्वविद्यालय और अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना और उपयोग।
सरकार द्वारा किसानों के हित में किए गए संस्थागत सुधारः-
- फसलों की बीमा सुविधा देना।
- सहकारी बैंकों का विकास कर किसानों को ऋण सुविधा उपलब्ध कराना।
- फसलों के समर्थन मूल्य का उचित निर्धारण कर प्रोत्साहित करना।
- मौसम संबंधी सूचनाओं को समय - समय पर प्रसारित करना।
- कृषि संबंधी नवीन तकनीक, औजारों, उर्वरकों आदि से संबंधित कार्यक्रम रेडियो तथा दूरदर्शन पर प्रसारित करना।
- निर्वाह कृषि: जहाँ किसान केवल अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए छोटे भूखंडों पर खेती करते हैं।
- वाणिज्यिक कृषि: बाजार में बेचने और लाभ कमाने के उद्देश्य से आधुनिक तकनीकों (HYV बीज, उर्वरक) का उपयोग करके की जाने वाली खेती।
- रोपण कृषि: विस्तृत क्षेत्र में केवल एक ही नकदी फसल (जैसे चाय, रबर, कॉफी) बोना।
- हरित क्रांति: उच्च उपज देने वाले बीजों और आधुनिक तकनीक से गेहूँ आदि के उत्पादन में भारी वृद्धि।
- श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड): भारत में दुग्ध (दूध) उत्पादन को बढ़ाने का एक सफल राष्ट्रीय कार्यक्रम।
कृषि केवल भारत की अर्थव्यवस्था का आधार ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। हालाँकि हरित क्रांति ने हमें खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया है, लेकिन इसने पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाया है। आज के समय में कृषि को टिकाऊ (sustainable) बनाने, किसानों को ऋण के जाल से निकालने और भूमंडलीकरण की चुनौतियों का सामना करने के लिए आधुनिक और जैविक खेती का संतुलित उपयोग आवश्यक है।
- रबी फसलें: अक्टूबर-दिसंबर में बोई जाती हैं (गेहूँ, चना, सरसों)।
- खरीफ फसलें: जून-जुलाई में मानसून के साथ बोई जाती हैं (चावल, मक्का, कपास)।
- जायद फसलें: रबी और खरीफ के बीच गर्मियों में उगाई जाती हैं (तरबूज, खीरा)।
- कपास के लिए: 210 पाला रहित दिन और काली मिट्टी आवश्यक है।
- चाय और कॉफी: मुख्य रूप से असम, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में उगाई जाने वाली रोपण फसलें हैं।
लघु उत्तरीय प्रश्न:
- प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि और वाणिज्यिक कृषि में क्या अंतर है?
- रबी और खरीफ फसलों में दो-दो उदाहरण देते हुए अंतर स्पष्ट करें।
- हरित क्रांति किसे कहते हैं और इसके दो नुकसान बताएँ।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न:
- चावल की खेती के लिए आवश्यक भौगोलिक परिस्थितियों (तापमान, वर्षा, मिट्टी) का वर्णन करें।
- भारत में कृषि उत्पादन में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा किए गए संस्थागत और तकनीकी सुधारों की चर्चा करें।
- भारतीय कृषि पर भूमंडलीकरण (वैश्वीकरण) के क्या प्रभाव पड़े हैं?
- भारत में घटते खाद्य उत्पादन और किसानों के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विस्तार से वर्णन करें।