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अध्याय-3: जल संसाधन
जल ही जीवन है। पृथ्वी का तीन-चौथाई हिस्सा पानी से ढका होने के बावजूद ताज़े और पीने योग्य पानी की मात्रा बहुत ही कम है। इस अध्याय में हम जानेंगे कि बढ़ती आबादी, शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण कैसे जल दुर्लभता (Water Scarcity) की समस्या पैदा हो रही है। साथ ही, हम जल संरक्षण के प्राचीन और आधुनिक तरीकों, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं (बाँधों) और वर्षा जल संचयन के विभिन्न तरीकों के बारे में विस्तार से समझेंगे।
- जल की उपलब्धता और कमी: वैश्विक और भारतीय संदर्भ में जल के आँकड़े और जल दुर्लभता के मुख्य कारण।
- बहुउद्देशीय परियोजनाएँ (बाँध): बाँधों के लाभ, उद्देश्य और इनसे जुड़े विवाद (जैसे: नर्मदा बचाओ आंदोलन)।
- प्राचीन और आधुनिक जल संरक्षण: प्राचीन भारत में जल प्रबंधन और आधुनिक समय में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) की तकनीकें।
- विशिष्ट जल संग्रहण तकनीकें: राजस्थान में 'टाँका', पहाड़ी क्षेत्रों में 'गुल' या 'कुल' और मेघालय में 'बाँस ड्रिप सिंचाई'।
- जल के बारे में कुछ रोचक तथ्य और जल दुर्लभता के कारण।
- औद्योगीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जल संसाधनों पर प्रभाव।
- प्राचीन काल की जलीय कृतियाँ (जैसे भोपाल झील, हौज खास)।
- बाँध क्या हैं? और इन्हें 'आधुनिक भारत के मंदिर' क्यों कहा गया है?
- वर्षा जल संचयन की विधियाँ: टाँका, पालर पानी, और बाँस ड्रिप सिंचाई।
- अत्यधिक सिंचाई के नकारात्मक परिणाम।
जल के कुछ रोचक तथ्य:-
- दुनिया में पानी की कुल मात्रा का 96.5 प्रतिशत समुद्र के रूप में मौजूद है ओर केवल 2.5 प्रतिशत मीठे पानी के रूप में अनुमानित है।
- भारत को वैश्विक वर्षा का लगभग 4 प्रतिशत प्राप्त होता है और पानी की प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष उपलब्धता के मामले में दुनिया में 133 वें स्थान पर है।
- ऐसी आशंका व्यक्त की जाती है कि 2025 तक, भारत के बड़े हिस्से पानी की कमी वाले देशों या क्षेत्रों में शामिल हो जाएंगे।
जल दुर्लभता:-
जल दुर्लभता का अर्थ है पानी की कमी होना।
जल दुर्लभता के कारण:-
- बड़ी आबादी
- सिंचित क्षेत्रों का विस्तार करने के लिए जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है।
- बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण के साथ पानी की अधिक माँग।
- विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच पानी की असमान पहुंच।
- उद्योगों द्वारा पानी का अत्यधिक उपयोग।
- शहरी क्षेत्रों में पानी का अधिक दोहन।
औद्योगीकरण तथा शहरीकरण किस प्रकार जलदुर्लभता के लिए उत्तरदायी है?
- स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में तेजी से औद्योगीकरण।
- उद्योगों की बढ़ती संख्या के कारण अलवणीय जल का अत्यधिक प्रयोग।
- शहर की बढ़ती आबादी तथा शहरी जीवन शैली के कारण जल ऊर्जा की आवश्यकता में तीव्र वृद्धि।
- शहरों तथा गाँवों में जल संसाधनों का अतिशोषण।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ:-
वे कंपनियाँ जिनके उद्योग संस्थान एक से अधिक देशों में कार्य करते हैं तथा अनेक देशों में पूंजी निवेश करते हैं तथा अधिक लाभ अर्जित करते हैं।
जल विद्युत:-
ऊँचे स्थानों से जल धारा को नीचे गिराकर उत्पन्न की गई विद्युत।
एक नवीकरणीय संसाधन होते हुए भी जल के संरक्षण तथा प्रबंधन की आवश्यकता क्यों है?
- विश्व में केवल 2.5 प्रतिशत ही ताजा जल है।
- जल संसाधनों का अति दोहन।
- बढ़ती जनसंख्या, अधिक मांग और असमान पहुँच।
- बढ़ता शहरी करण।
- औद्योगीकीकरण।
प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ:-
- ईसा से एक शताब्दी पहले इलाहाबाद के नजदीक श्रिगंवेरा में गंगा नदी की बाढ़ के जल को संरक्षित करने के लिए एक उत्कृष्ट जल संग्रहण तंत्र बनाया गया था।
- चन्द्रगुप्त मौर्य के समय बृहत् स्तर पर बाँध, झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण करवाया गया।
- कलिंग (ओडिशा), नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश) बेन्नूर (कर्नाटक) और कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में उत्कृष्ट सिंचाई तंत्र होने के सबूत मिलते हैं।
- अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक, भोपाल झील, 11 वीं शताब्दी में बनाई गई।
- 14 वीं शताब्दी में इल्तुतमिश ने दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र में जल की सप्लाई के लिए हौज खास (एक विशिष्ट तालाब) बनवाया।
बहुउद्देशीय परियोजनाएँ:-
नदियों पर बाँध बनाकर एक बार में अनेक उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है।
बाँध:-
बहते जल को रोकने, दिशा देने या बहाव कम करने के लिए खड़ी की गई बाधा है जो आमतौर पर जलाशय, झील अथवा जलभरण बनाती है।
बाँधों से होने वाले लाभ:-
- सिंचाई।
- विद्युत उत्पादन।
- घरेलू तथा औद्योगिक आवश्यकता हेतु जल आपूर्ति।
- बाढ़ नियंत्रण।
- मनोरंजन तथा पर्यटन।
- मत्स्य पालन।
बांधों को अब बहुउद्देशीय परियोजना क्यों कहा जाता हैं?
- बाँध से एकत्र जल का उपयोग एक दूसरे पर निर्भर हैं।
- बांधों का निर्माण बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, बिजली उत्पादन ओर वितरण के लिए किया जाता हैं।
- जल, वनस्पति और मिट्टी के सरंक्षण के लिए बांधों का निर्माण किया जाता हैं।
- यह पर्यटन को बढ़वा देने में भी मदद करता हैं।
जवाहर लाल नेहरू ने ‘ बाँधों को आधुनिक भारत के मंदिर ‘ क्यों कहा है?
बाँधों से अनेक लाभ हैं। ये विकास में योगदान करते हैं इसलिए नेहरू जी ने इन्हें आधुनिक भारत के मंदिर कहा था।
भारत में बहुउद्देशीय परियोजनाओं:-
- स्वतंत्रता के बाद उनके एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन दृष्टिकोण के साथ लॉन्च किया गया।
- जवाहरलाल नेहरू ने बांधों को गर्व से आधुनिक भारत के मंदिरों के रूप में घोषित किया।
- यह कृषि और ग्राम अर्थव्यवस्था के विकास को तेजी से औद्योगिकीकरण और शहरी अर्थव्यवस्था के विकास के साथ एकीकृत करेगा।
बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना:-
नदी पर बाँध बनाकर इससे अनेक प्रकार के उद्देश्यों को पूरा करना, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना कहलाता है।
बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना के उद्देश्य:-
- जल विद्युत उत्पादन
- सिंचाई
- घरेलू व औद्योगिक जल आपूर्ति
- नौचालन व पर्यटन
- बाढ़ नियंत्रण
- मछली पालन
बहु–उद्देशीय नदी परियोजनाओं के लाभ:-
- सिंचाई
- विद्युत उत्पादन
- बाढ नियंत्रण
- मत्स्य प्रजनन
- अंतदेर्शीय नौवहन
- घरेलू और औद्योगिक उपयोग
बहुउद्देशीय नदी परियोजना की आलोचना:-
- नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करते है और जलाशय के अत्यधिक अवसादन एकत्र होता है।
- नदी की जलीय जीवन की नकारात्मक तरीके से प्रभावित करता है।
- स्थानीय समुदाय का बड़े पैमाने पर विस्थापन।
- बाढ़ के मैदान पर बनाए गए जलाशय मौजूद वनस्पति को डूबा देंगे और एक समय के बाद मृदा का क्षरण करेंगे।
नर्मदा बचाओ आंदोलन:-
- नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बाँध निर्माण के विरोध में था।
- आंदोलन गैर सरकारी संगठन (NGO) द्वारा संचालित।
- जनजातीय लोगों, किसानों, पर्यावरणविदों व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का सरदार सरोवर परियोजना के विरोध में लामबंद होना।
- आरंभ में यह आंदोलन जंगलों के बाँध के पानी में डूबने के मुद्दे पर केंद्रित।
- बाद में इसका लक्ष्य विस्थापितों का पुनर्वास करना हो गया।
भूमिगत जल:-
मृदा के नीचे बिछे हुए शैल आस्तरण छिद्रों और परतों में एकत्र होने वाला जल।
वर्षा जल संग्रहण:-
- एक तकनीक जिसमें वर्षा जल को खाली स्थानों, घरों में टैंक में, बेकार पड़े कुएँ में भरा जाता है। बाद में इसका प्रयोग किया जाता है।
- पर्वतीय क्षेत्रों में ‘ गुल ‘ तथा ‘ कुल ‘ जैसी वाहिकाओं से नदी की धारा का रास्ता बदलकर खेतों की सिचांई।
- राजस्थान में पीने का जल एकत्रित करने के लिए छत वर्षा जल संग्रहण आम तकनीक है।
वर्षा जल संचयन की विधियां:-
- पहाड़ी क्षेत्रों में, लोगों ने कृषि के लिए गुल और कुल जैसी वाहिकाएं बनायीं है। लोगों ने पश्चिमी हिमालय में गुल और कुल जैसी वाहिकाएं बनायी।
- पश्चिम बंगाल में बाढ़ के दौरान बाढ़ जल वाहिकाएँ बनाते हैं।
- राजस्थान के शुष्क और अर्ध – शुष्क क्षेत्रों में, कृषि क्षेत्रों को बरसाती भंडारण संरचनाओं में परिवर्तित किया गया।
- शुष्क तथा अर्ध शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल एकत्रित करने के लिए गड्ढ़ों का निर्माण।
- छत पर वर्षा जल संचयन।
- बीकानेर, फलौदी और बाड़मेर में पीने हेतु भूमिगत टैंक या टाँका।
- मेघालय में बॉस की ड्रिप सिंचाई प्रणाली।
ताजे पानी के स्त्रोत:-
सूत्रों का कहना है लगभग सभी ताजा पानी के मूल स्रोत है वर्षा से वातावरण के रूप में, धुंध , बारिश और बर्फ । धुंध, बारिश या बर्फ के रूप में गिरने वाले ताजे पानी में वातावरण से घुलने वाली सामग्री और समुद्र और भूमि से सामग्री होती है, जिस पर बारिश वाले बादलों ने यात्रा की है।
- वर्षा से।
- सतह जल – नदियों, झीलों आदि में।
- भूजल – भूमि में संग्रहित जल, जो बारिश से रिचार्ज हो जाता है।
बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली:-
नदियों व झरनों के जल को बाँस के बने पाइपों द्वारा एकत्रित करके सिंचाई करना बाँस ड्रिप सिचांई कहलाता है।
प्राचीन भारत में जल संरक्षण:-
- पहली शताब्दी ईसा पूर्व में, इलाहाबाद में परिष्कृत जल संचयन प्रणाली थी।
- चंद्रगुप्त मौर्य के समय में बाँध, झीलें और सिंचाई प्रणालियों बड़े पैमाने पर बनायी गयी थीं।
- ओडिशा के कलिंग, नागार्जुनकोंडा में परिष्कृत सिंचाई कार्य पाए गए हैं, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में बेन्नूर और महाराष्ट्र में कोल्हापुर।
- 11 वीं शताब्दी में बनी भोपाल झील अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक थी।
- 14 वीं शताब्दी में, इल्तुतमिश ने पानी की आपूर्ति के लिए दिल्ली के हौज खास में एक टैंक का निर्माण किया सिरी किला क्षेत्र में।
टाँका:-
टांका एक पारम्परिक तकनीकी का थार रेगिस्तान (राजस्थान) में प्रयोग किया जाने वाला पानी का एक बड़ा गढ्ढा है। इसमें पानी को इकट्ठा किया जाता है तथा बाल्टी की मदद से बाहर निकाल कर उपयोग में लिया जाता है। यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में ही बनाए जाते हैं। टांका सामान्यतया: गोलाकार का ही होता है लेकिन वर्तमान में चोकोर टांके भी बनाए जाते हैं। टाँका में वर्षा जल अगली वर्षा ऋतु तक संग्रहित किया जा सकता है। यह इसे जल की कमी वाली ग्रीष्म ऋतु तक पीने का जल उपलब्ध करवाने वाला जल स्रोत बनाता है।
पालर पानी:-
यह पानी का एक रूप है। वह पानी जो सीधे बरसात से हमें बारिश द्वारा प्राप्त होता है और वह धरातल पर बहते हुए नदी, तालाब आदि के माध्यम से रोका जाता है। ऐसा पानी पालर पानी कहलाता है। वर्षा का पानी जो भूमिगत टैंकों में जमा होता है पीने योग्य पानी हैं। इसे पालर पानी कहा जाता है।
राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में इसका महत्व:-
- यह पेयजल का मुख्य स्त्रोत है, जब अन्य सभी स्त्रोत सूख गए हों।
- इसे पेयजल का शुद्धतम रूप माना जाता हैं।
- गर्मियों में, ये टैंक भूमिगत कमरों और उनसे जुड़े कमरों को ठंडा, साफ रखते हैं।
भारत देश में जल का अभाव बढ़ने के कारण:-
- भारत मानसूनी जलवायु का देश।
- कई बार मानसून असफल होने से जल की कमी बढ़ रही है।
- सिंचाई के जल की मांग में तीव्र वृद्धि।
- औद्योगिक क्रियाओं के कारण भूमिगत जल स्तर का गिरना।
- शहरीकरण की गति में वृद्धि के कारण जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव।
- बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने के कारण।
अत्यधिक सिंचाई के नकारात्मक प्रभाव:-
- इससे मिट्टी के लवणीकरण जैसे बड़े पारिस्थितिक परिणाम हो सकते हैं।
- इससे मिट्टी की उर्वरता में कमी।
- इससे पानी की कमी हो जाती हैं।
- जल दुर्लभता (Water Scarcity): पानी की मांग की तुलना में पीने योग्य और ताज़े पानी की कमी होना।
- बहुउद्देशीय परियोजनाएँ: नदियों पर बाँध बनाकर एक ही समय में सिंचाई, बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण और मत्स्य पालन जैसे कई उद्देश्य प्राप्त करना।
- वर्षा जल संचयन: बारिश के पानी को भविष्य के उपयोग के लिए छतों, गड्ढों या भूमिगत टैंकों में इकट्ठा करने की प्रक्रिया।
- गुल और कुल: पश्चिमी हिमालय (पहाड़ी क्षेत्रों) में नदियों की धारा को बदलकर सिंचाई के लिए बनाई जाने वाली पानी की वाहिकाएँ (channels)।
- टाँका (Tanka): राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों (बीकानेर, बाड़मेर) में बारिश के पानी को पीने के लिए इकट्ठा करने वाले बड़े भूमिगत टैंक।
- पालर पानी: बारिश का वह पानी जो सीधे प्राप्त होता है और भूमिगत टैंकों में जमा होता है; इसे सबसे शुद्ध जल माना जाता है।
जल एक नवीकरणीय लेकिन सीमित संसाधन है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण और गलत इस्तेमाल ने हमें जल संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। प्राचीन भारत से प्रेरणा लेकर और आधुनिक वर्षा जल संचयन तकनीकों को अपनाकर ही हम पानी की बूँद-बूँद बचा सकते हैं। बाँधों जैसे बड़े निर्माण विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन हमें पर्यावरण और विस्थापित होने वाले लोगों (नर्मदा बचाओ आंदोलन) की समस्याओं का भी समाधान खोजना होगा।
- 96.5%: पृथ्वी का कुल पानी महासागरों में है (खारा पानी)।
- 2.5%: पृथ्वी पर मौजूद कुल मीठा (ताज़ा) पानी।
- 11वीं शताब्दी: भोपाल की कृत्रिम झील का निर्माण।
- 14वीं शताब्दी: इल्तुतमिश द्वारा दिल्ली में हौज खास का निर्माण।
- मेघालय: बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली के लिए प्रसिद्ध।
- राजस्थान (थार): 'टाँका' और 'छत वर्षा जल संग्रहण' का व्यापक उपयोग।
लघु उत्तरीय प्रश्न:
- जल दुर्लभता क्या है? इसके दो मुख्य कारण बताएँ।
- पहाड़ी क्षेत्रों में गुल और कुल का क्या उपयोग है?
- पालर पानी किसे कहते हैं और यह राजस्थान में क्यों महत्वपूर्ण है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न:
- बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं (बाँधों) से होने वाले लाभ और हानियों की विस्तार से तुलना करें।
- राजस्थान के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण (टाँका) किस प्रकार किया जाता है? व्याख्या कीजिए।
- औद्योगीकरण और शहरीकरण ने किस प्रकार भारत में जल संकट को बढ़ाया है?
- नर्मदा बचाओ आंदोलन क्या था? इसके मुख्य कारण और उद्देश्य क्या थे?