मुद्रा और साख (Money and Credit)
JAC Board Class 10th Economics Important Subjective Notes
Most Important Subjective Questions
उत्तर: मुद्रा को विनिमय का माध्यम इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह वस्तुओं और सेवाओं के लेन-देन में एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है।
प्राचीन काल में 'वस्तु विनिमय प्रणाली' प्रचलित थी, जिसमें एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का लेन-देन होता था। इसमें 'आवश्यकताओं के दोहरे संयोग' की समस्या होती थी। मुद्रा के आने से यह समस्या समाप्त हो गई क्योंकि अब कोई भी व्यक्ति अपनी वस्तु बेचकर मुद्रा प्राप्त कर सकता है और फिर उस मुद्रा से अपनी पसंद की कोई भी अन्य वस्तु खरीद सकता है। चूँकि मुद्रा विनिमय प्रक्रिया में एक मध्यवर्ती भूमिका निभाती है, इसे विनिमय का माध्यम कहा जाता है।
उत्तर: आवश्यकताओं का दोहरा संयोग वस्तु विनिमय प्रणाली की एक अनिवार्य शर्त है। इसका अर्थ है कि विनिमय करने वाले दोनों पक्ष एक-दूसरे की वस्तुओं को खरीदने और बेचने पर सहमत हों।
उदाहरण: यदि एक जूता निर्माता को गेहूं खरीदना है, तो उसे एक ऐसे किसान को खोजना होगा जो न केवल गेहूं बेचना चाहता हो, बल्कि बदले में जूते भी खरीदना चाहता हो। यदि किसान को जूते की जरूरत नहीं है, तो लेनदेन संभव नहीं होगा। मुद्रा के प्रयोग से इस कठिन शर्त की जरूरत खत्म हो गई है।
उत्तर: मुद्रा के आधुनिक रूपों में करेंसी (कागज के नोट और सिक्के) तथा बैंकों में निक्षेप (जमा) शामिल हैं। आधुनिक मुद्रा का अपना कोई बहुमूल्य मूल्य नहीं होता (जैसे सोने या चाँदी के सिक्के का होता था), लेकिन इसे सरकार द्वारा अधिकृत किया जाता है।
चेक द्वारा भुगतान: चेक एक ऐसा कागज है जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चेक पर लिखे नाम वाले व्यक्ति को एक निश्चित रकम का भुगतान करने का आदेश देता है। इसमें नगद मुद्रा की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सीधे एक खाते से दूसरे खाते में पैसा चला जाता है।
उत्तर: बैंक लोगों से जमा राशि स्वीकार करते हैं और उसका एक छोटा हिस्सा (भारत में लगभग 15 प्रतिशत) नगद के रूप में अपने पास रखते हैं ताकि जमाकर्ताओं को भुगतान किया जा सके।
जमा राशि के बड़े हिस्से का उपयोग बैंक ऋण देने के लिए करते हैं। बैंक कर्जदारों से अधिक ब्याज वसूलते हैं और जमाकर्ताओं को कम ब्याज देते हैं। इन दोनों ब्याज दरों के बीच का अंतर ही बैंक की आय का मुख्य स्रोत होता है। इस प्रकार बैंक जमाकर्ताओं और कर्जदारों के बीच मध्यस्थता करते हैं।
उत्तर: साख या ऋण की स्थिति व्यक्ति की परिस्थिति पर निर्भर करती है:
1. सकारात्मक स्थिति: यदि कर्ज का उपयोग उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाता है और व्यक्ति समय पर ऋण चुका देता है, तो उसकी आय बढ़ती है और उसकी स्थिति पहले से बेहतर हो जाती है। (जैसे- किसी त्यौहार के ऑर्डर के लिए लिया गया ऋण)।
2. नकारात्मक स्थिति (कर्ज का जाल): यदि फसल बर्बाद हो जाए या निवेश विफल हो जाए, तो कर्जदार ऋण नहीं चुका पाता। उसे पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ता है या अपनी संपत्ति बेचनी पड़ती है। इसे 'कर्ज का जाल' (Debt-trap) कहते हैं।
उत्तर: प्रत्येक ऋण समझौते में ब्याज दर निश्चित होती है। इसके अलावा ऋण की शर्तों में समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागजात और भुगतान का तरीका शामिल होता है।
समर्थक ऋणाधार (Collateral): यह एक ऐसी संपत्ति है जिसका मालिक कर्जदार होता है (जैसे- ज़मीन, मकान, गाड़ी, बैंक जमा) और इसे वह उधारदाता को गारंटी के रूप में देता है। यदि कर्जदार ऋण चुकाने में विफल रहता है, तो उधारदाता को इस संपत्ति को बेचकर अपना पैसा वसूलने का अधिकार होता है।
उत्तर: भारत में ऋण के दो मुख्य स्रोत हैं:
1. औपचारिक क्षेत्रक: इसमें बैंक और सहकारी समितियां शामिल हैं। ये कम ब्याज दर वसूलते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक इनकी कार्यप्रणाली की निगरानी करता है। ये नियमों और कानूनों का पालन करते हैं।
2. अनौपचारिक क्षेत्रक: इसमें साहूकार, व्यापारी, रिश्तेदार और दोस्त शामिल हैं। ये बहुत ऊँची ब्याज दर वसूलते हैं। इन पर निगरानी रखने वाली कोई संस्था नहीं है। ये कर्ज वसूलने के लिए नाजायज तरीकों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, जिससे कर्जदार शोषण का शिकार होता है।
उत्तर: भारतीय रिजर्व बैंक भारत का केंद्रीय बैंक है। इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है:
1. यह भारत सरकार की ओर से करेंसी नोट जारी करता है।
2. यह औपचारिक क्षेत्रक (बैंकों) की कार्यप्रणाली पर नजर रखता है।
3. यह सुनिश्चित करता है कि बैंक केवल अमीर व्यापारियों को ही नहीं, बल्कि छोटे किसानों और उद्योगों को भी ऋण दें।
4. बैंक कितना नगद अपने पास रखते हैं, इसकी जानकारी RBI को देनी पड़ती है।
5. यह ब्याज दरों और साख की उपलब्धता को नियंत्रित करता है।
उत्तर: स्वयं सहायता समूह ग्रामीण गरीबों (विशेषकर महिलाओं) का एक छोटा समूह होता है, जो अपनी बचत को इकट्ठा करते हैं। इसमें आमतौर पर 15-20 सदस्य होते हैं।
लाभ:
1. सदस्य अपनी जरूरतों के लिए समूह से कम ब्याज पर कर्ज ले सकते हैं।
2. समूह के नियमित रूप से बचत करने पर बैंक से भी आसानी से ऋण मिल जाता है।
3. यह महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है।
4. समूह की बैठकों में स्वास्थ्य, पोषण और घरेलू हिंसा जैसे सामाजिक विषयों पर चर्चा करने का मंच मिलता है।
उत्तर: भारत में आज भी गरीब लोग बैंक के बजाय साहूकारों पर निर्भर हैं, इसके मुख्य कारण हैं:
1. ग्रामीण इलाकों में बैंकों की संख्या कम है।
2. बैंक से ऋण लेने के लिए बहुत अधिक कागजी कार्रवाई की जरूरत होती है।
3. सबसे बड़ी बाधा 'समर्थक ऋणाधार' (Collateral) का अभाव है। गरीबों के पास बैंक को गारंटी देने के लिए ज़मीन या संपत्ति नहीं होती।
साहूकार गरीब कर्जदारों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, इसलिए वे बिना किसी कागजात या गारंटी के भी ऋण दे देते हैं, हालांकि वे ब्याज बहुत अधिक वसूलते हैं।