वन एवं वन्य जीव संसाधन
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ एवं विषयनिष्ठ प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
बीज बचाओ आंदोलन क्या था ?
धरातल का कितना भाग जल से ढका हुआ है ?
भारतीय वन्य जीवन (रक्षण) अधिनियम कब लागू किया गया ?
भारत में उपलब्ध स्तनधारियों में से कितने प्रतिशत को लुप्त होने का खतरा है ?
वे जातियाँ जो प्राकृतिक या भौगोलिक सीमाओं से अलग विशेष क्षेत्रों में पाई जाती हैं, उन्हें किस प्रकार की जातियों के श्रेणी में रखा जाता है ?
भारत में कौन-सी जाति काले हिरण की रक्षा के लिए प्रसिद्ध है ?
अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ के द्वारा विभाजन में किस श्रेणी को रखा गया है ?
निकोबारी कबूतर किस जातियों के श्रेणी में आता है ?
चिपको आंदोलन किससे संबंधित है ?
निम्नांकित में से किस राज्य में सर्वाधिक स्थायी वन क्षेत्र है?
इनमें से कौन-सा संरक्षण तरीका समुदायों की सीधी भागीदारी नहीं करता?
विषयनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Subjective)
उत्तर- बहुउद्देशीय परियोजना वह परियोजना होती है जिसमें एक ही परियोजना के तहत कई उद्देश्यों को एक साथ पूरा किया जाता है, जैसे- सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, पेयजल आपूर्ति, मछली पालन और पर्यटन जो प्राकृतिक संसाधनों का कई तरीकों से उपयोग सुनिश्चित करती है, जैसे- भाखड़ा नांगल बांध।
उत्तर-किसी देश की वनस्पतियों में उस देश का समस्त वनस्पति जगत शामिल होता है। इसमें वनों में उगने वाले वृक्ष, मनुष्य द्वारा उगाए गए फूलदार और बिना फूलों वाले वृक्ष, घास वाले क्षेत्र व झाड़ियाँ आदि सम्मिलित हैं। भारत में लगभग 49,000 जातियों के पौधे पाए जाते हैं। इनमें से 5,000 ऐसे हैं जो केवल भारत में ही मिलते हैं।
जीव-जन्तुओं में पक्षी, मछलियाँ और पशु आदि शामिल हैं जिनमें स्तनीय पशु, रेंगने वाले पशु, कीड़े-मकोड़े, जल और स्थल में रहने वाले प्राणी आदि सम्मिलित हैं। भारत का पशु-जगत धनी तथा विभिन्न प्रकार का है। भारत में पशुओं की लगभग 81,000 जातियाँ हैं।
उत्तर: जैव विविधता का अर्थ है किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पौधों और जीवों की प्रजातियों का समूह। यह पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उत्तर : प्रशासनिक आधार पर भारत में वनों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा गया है-
(1) आरक्षित वन : ये वे वन हैं जो इमारती लकड़ी या वन उत्पादों को प्राप्त करने के लिए पूर्णतः सुरक्षित कर लिए गए हैं। इन वनों में पशुओं को चराने या खेती करने की अनुमति नहीं दी जाती है। आरक्षित वनों को सर्वाधिक मूल्यवान माना जाता है। भारत के कुल वन क्षेत्र के आधे से अधिक वन क्षेत्र आरक्षित वन घोषित किये गये हैं।
(2) रक्षित वन : इन वनों को और अधिक नष्ट होने से बचाने के लिए इनकी सुरक्षा की जाती है। इनका रख-रखाव इमारती लकड़ी और अन्य पदार्थों और उनके बचाव के लिए किया जाता है। इन वनों में पशुओं को चराने व खेती करने की अनुमति कुछ विशिष्ट प्रतिबन्धों के साथ प्रदान की जाती है। वन विभाग के अनुसार देश के कुल वन क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रक्षित वनों का है।
(3) अवर्गीकत वन : देश में अन्य सभी प्रकार के बन और बंजर भूमि जो कि सरकार, व्यक्तियों और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं, अवर्गीकृत बन कहलाते हैं। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में और गुजरात में अधिकतर वन क्षेत्र अवर्गीकृत वन हैं तथा स्थानीय समुदायों के प्रबंधन में हैं।
उत्तर : भारत में वन और वन्य जीवन के हास के उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं -
(1) औपनिवेशिक काल की क्रियाएँ: रेल लाइनों के विस्तार, कृषि, व्यवसाय, वाणिज्य, वानिकी और खनन क्रियाओं में वृद्धि।
(2) कृषि का विस्तार : स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त कृषि का फैलाव।
(3) खनन क्रियाएँ: पश्चिमी बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व डोलोमाइट के खनन के कारण गंभीर खतरे में है।
(4) स्थानांतरी (झूम) खेती: पूर्वोत्तर भारत एवं मध्य भारत में वनों की कटाई।
(5) पशुचारण और ईंधन की लकड़ी।
(6) विकास परियोजनाएँ: नदी घाटी परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों को साफ करना पड़ा।
उत्तर : वन संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं-
a. वनों की अंधाधुंध कटाई पर प्रतिबन्ध लगाना।
b. अनियंत्रित पशुचारण पर रोक लगाना।
c. लकड़ी के ईंधन का कम से कम उपयोग किया जाये।
d. वनों को हानिकारक कीड़े-मकोड़ों, बीमारियों एवं आग से बचाया जाये।
e. वनों से वृक्ष काटने पर उनके स्थान पर वृक्षारोपण करना आवश्यक हो।
f. ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों का विकास किया जाये।
g. वन एवं वन्य जीवन कानूनों को कड़ाई से लागू किया जाये।
h. वनों की उपयोगिता व महत्ता की जानकारी हेतु जनचेतना पैदा की जाये।
उत्तर: भारत में वन और वन्य जीव संरक्षण की परंपरा बहुत पुरानी है। यहाँ के स्थानीय समुदायों ने सरकारी प्रयासों से पहले ही वनों को अपनी धरोहर मानकर उनका संरक्षण किया है। इसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:
सरिस्का बाघ रिजर्व: राजस्थान के गाँवों के लोगों ने सरिस्का बाघ रिजर्व में होने वाले खनन कार्य के विरुद्ध लंबी लड़ाई लड़ी और वन्य जीव रक्षण अधिनियम का हवाला देकर इसे बंद करवाया।
बिश्नोई समुदाय: राजस्थान के गाँवों में 'बिश्नोई' समुदाय के लोग काले हिरण, चिंकारा, नीलगाय और मोर की रक्षा अपनी संतान की तरह करते हैं। यहाँ इन जीवों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता।
भैंरोदेव डाकव 'सोनचुरी': राजस्थान के अलवर जिले के पाँच गाँवों के लोगों ने मिलकर 1,200 हेक्टेयर वन भूमि को 'भैंरोदेव डाकव सोनचुरी' घोषित कर दिया है। यहाँ उनके अपने ही कड़े कानून चलते हैं जो शिकार को वर्जित करते हैं और बाहरी हस्तक्षेप से वन्य जीवन को बचाते हैं।
चिपको आंदोलन: हिमालय क्षेत्र में स्थानीय समुदायों ने पेड़ों से चिपककर उनकी कटाई का विरोध किया। यह आंदोलन सफल रहा और इसने यह साबित किया कि समुदाय मिलकर वनों को बचा सकते हैं।
बीज बचाओ आंदोलन: टिहरी (उत्तराखंड) के किसानों ने यह दिखाया कि बिना रासायनिक खादों के भी विविधतापूर्ण फसलों का उत्पादन संभव है, जिससे भूमि और पर्यावरण दोनों की रक्षा होती है।
उत्तर: भारत एक ऐसा देश है जहाँ प्रकृति की पूजा को धर्म का हिस्सा माना गया है। हमारे समाज में प्रचलित कई रीति-रिवाज अनजाने में ही वनों और वन्य जीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
1. पवित्र पेड़ों की पूजा: भारतीय समाज में कई पेड़ों को देवी-देवताओं का निवास माना जाता है। उदाहरण के लिए, मुण्डा और संथाल जनजातियाँ महुआ और कदम के पेड़ों की पूजा करती हैं। इसी प्रकार, हिंदू धर्म में पीपल और वटवृक्ष को अत्यंत पवित्र माना जाता है और उन्हें काटने को पाप समझा जाता है।
2. देवकुल्स (Sacred Groves): देश के कई हिस्सों में वनों के कुछ बड़े भागों को 'देवी-देवताओं के वन' के रूप में छोड़ दिया जाता है। स्थानीय लोग इन क्षेत्रों से एक तिनका भी नहीं तोड़ते और न ही शिकार करते हैं, जिससे यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक अवस्था में सुरक्षित रहते हैं।
3. शादी-ब्याह के रीति-रिवाज: ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में विवाह के समय इमली और आम के पेड़ों की पूजा करने की परंपरा है, जो समुदायों के पेड़ों के प्रति गहरे लगाव को दर्शाती है।
4. वन्य जीवों का धार्मिक संबंध: भारतीय संस्कृति में हनुमान जी के रूप में बंदरों को, गणेश जी के रूप में हाथियों को और माँ दुर्गा की सवारी के रूप में बाघों को पूजा जाता है। मंदिरों के आस-पास मिलने वाले लंगूरों और बंदरों को लोग श्रद्धापूर्वक भोजन कराते हैं। बिश्नोई गाँवों में जीव-जंतुओं को परिवार का सदस्य माना जाता है।
निष्कर्ष: अतः यह स्पष्ट है कि यदि हम इन पुराने रीति-रिवाजों और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संरक्षण विधियों के साथ जोड़ें, तो हम अपनी प्राकृतिक संपदा को और भी बेहतर तरीके से सुरक्षित रख सकते हैं।