महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
उत्तर : हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, एक 'संसाधन' कहलाती है।
उत्तर : संसाधनों का वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है -
- (i) उत्पत्ति के आधार पर - जैव और अजैव
- (ii) समाप्यता के आधार पर - नवीकरणीय और अनवीकरणीय
- (iii) स्वामित्व के आधार पर - व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय, वैश्विक
- (iv) विकास के स्तर के आधार पर - संभावी, विकसित भंडार, संचित कोष
नवीकरणीय और अनवीकरणीय में अंतर: नवीकरणीय संसाधन वे हैं जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पुन: उत्पन्न किया जा सकता है (जैसे सौर ऊर्जा)। अनवीकरणीय संसाधन वे हैं जिन्हें बनने में लाखों वर्ष लगते हैं और एक बार उपयोग के बाद समाप्त हो जाते हैं (जैसे जीवाश्म ईंधन)।
संसाधन नियोजन की आवश्यकता: भारत के किसी प्रदेश में एक प्रकार का संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है किन्तु दूसरे प्रकार के संसाधनों की कमी है। कुछ प्रदेश ऐसे भी हैं जो संसाधनों की उपलब्धता में आत्मनिर्भर हैं लेकिन कुछ प्रदेश ऐसे भी हैं जहाँ महत्त्वपूर्ण संसाधनों की अत्यधिक कमी है। इसी कारण देश में संसाधन नियोजन की आवश्यकता है।
उत्तर : सतत् पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाएं हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे।
- (1) संसाधनों का अधिक उपयोग प्रौद्योगिक और आर्थिक विकास से सीधे संबंधित है।
- (2) प्रौद्योगिकी के विकास के कारण आधुनिक मशीनों एवं औजारों द्वारा संसाधनों का दोहन भारी पैमाने पर संभव हुआ।
- (3) जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी का विकास होता गया संसाधनों का दोहन भारी पैमाने पर किया जाने लगा।
- (4) आर्थिक विकास से लोगों की आवश्यकता पूर्ति के लिए अधिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ी।
- (5) औपनिवेशिक काल में साम्राज्यवादी देशों ने अपनी उच्च प्रौद्योगिकी के माध्यम से संसाधनों का दोहन किया, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई।
उत्तर : संसाधन पृथ्वी पर सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं। यदि संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग होता रहा तो भविष्य की पीढ़ी के समक्ष गंभीर कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जायेंगी। इसके मुख्य कारण हैं:
- (1) वनों के विनाश से प्रदूषण इतना बढ़ जायेगा कि मानव जीवन खतरे में पड़ जायेगा।
- (2) भूमिगत जल के निरंतर उपयोग से जल-स्तर नीचा हो गया है जिससे कृषि पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
- (3) खनिज संसाधनों के बिना कारखाने चलाना असंभव हो जायेगा।
- (4) बढ़ते आवास के कारण कृषि योग्य भूमि दुर्लभ हो गयी है, अतः योजनाबद्ध उपयोग आवश्यक है।
भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग कि.मी. है। इसमें लगभग 43 प्रतिशत मैदान, 30 प्रतिशत पर्वत और 27 प्रतिशत पठारी क्षेत्र हैं।
वन क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं होने के कारण:
- (1) जनसंख्या वृद्धि के कारण वनों को काटकर कृषि क्षेत्रों का विस्तारीकरण।
- (2) आवास, सड़क मार्ग तथा रेलवे लाइन के निर्माण के लिए वनों की कटाई।
- (3) वनों को काटकर औद्योगिक इकाइयों की स्थापना।
उत्तर- प्राकृतिक तथा मानव निर्मित कारणों से मृदा की उर्वरा शक्ति या उपजाऊपन में लगातार होने वाली कमी को भूमि क्षरण या भूमि निम्नीकरण कहते हैं।
प्रमुख कारण:
- (क) भूमि अपरदन- पवन, जल तथा हिमनद द्वारा ऊपरी परत का नष्ट होना।
- (ख) भूमि प्रदूषण- उद्योगों का प्रदूषित जल और कूड़ा-करकट।
- (ग) पशुचारण तथा वनों कटाई- अंधाधुंध कटाई और अति चराई।
- (घ) उद्योग धंधे - सीमेंट और पत्थर उद्योगों से निकलने वाली भारी धूल का खेतों में जमा होना।
(1) मानवीय कारक: वनों की कटाई, अति पशुचारण, निर्माण एवं खनन, दोषपूर्ण कृषि पद्धति मृदा अपरदन के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं।
(2) प्राकृतिक कारक: पवन, जल तथा हिमनद मुख्य कारक हैं। बहता जल गहरी अवनलिकाएँ बनाता है, जिससे मिट्टी का कटाव तेजी से होता है। पवन द्वारा रेतीली भूमि से मिट्टी उड़ाकर ले जाने से भी अपरदन होता है।
उत्तर: भारत में भौगोलिक विविधता के कारण निम्नलिखित प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं:
- 1. जलोढ़ मृदा: यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण और उपजाऊ मृदा है, जो सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपों से बनी है।
- 2. काली मृदा: इसे 'रेगुर' मृदा भी कहते हैं। यह कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है और महाराष्ट्र, गुजरात में पाई जाती है।
- 3. लाल और पीली मृदा: यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों और आग्नेय चट्टानों वाले हिस्सों में पाई जाती है। लोहे के अंश के कारण इसका रंग लाल होता है।
- 4. लैटेराइट मृदा: यह मिट्टी भारी वर्षा और उच्च तापमान वाले क्षेत्रों में विकसित होती है। यह चाय और काजू के लिए उपयोगी है।
- 5. मरुस्थलीय मृदा: इसका रंग लाल या भूरा होता है। यह रेतीली और लवणीय होती है, जो मुख्य रूप से राजस्थान में पाई जाती है।
- 6. वन मृदा: यह मिट्टी मुख्य रूप से पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ पर्याप्त वर्षा वन उपलब्ध हैं।