संसाधन (Resources)

सम्पूर्ण अध्याय के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | Merit Yard Special

  • वैसी वस्तुएं जो मानव जीवन के आवश्यकता को पूरा करते हैं, संसाधन कहलाते हैं ।
  • विश्व में संसाधनों के भंडार सीमित है इसलिए इसका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से होना चाहिए ताकि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ अगली पीढ़ी भी इन संसाधनों का उपयोग कर सकें ।
उत्तर : सतत पोषणीय विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए, और वर्तमान में विकास की प्रक्रिया चलती रहे और भविष्य की पीढ़ी के लिए भी संसाधन बचा रहे।
उत्तर : हमारे पर्यावरण में मौजूद वे सारी वस्तुएं जिनमें जीवन है अर्थात् सजीव है, जैव संसाधन कहलाते है। जैसे:- मनुष्य, वनस्पतिजात, प्राणीजात, मत्स्य जीवन, पशुधन इत्यादि।
उत्तर : संसाधनों का वर्गीकरण निम्नलिखित आधार पर किया जा सकता है:
  • उत्पत्ति के आधार - जैव और अजैव
  • समाप्यता के आधार पर नवीकरणीय और अनवीकरणीय
  • स्वामित्व के अधार पर - व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय, अन्तराष्ट्रीय
  • विकास के स्तर के आधार पर संभावी संसाधन, विकसित संसाधन, भंडार, संचित कोष
नवीकरणीय संसाधन:
  • (i) इस संसाधन का प्रयोग बार-बार किया जा सकता हैं।
  • (ii) इस संसाधन का पुनर्निर्माण प्रकृति के द्वारा पुनः किया जाता है।
  • (iii) नवीकरणीय संसाधनों के उदाहरण जल, पेड़-पौधे, जीव जंतु, पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा ।
अनवीकरणीय संसाधन:
  • (i) इन संसाधनों का उपयोग करने के बाद समाप्त हो जाते हैं।
  • (ii) इस संसाधनों का पुनर्निर्माण नहीं हो पाता है |
  • (iii) अनवीकरणीय संसाधन के उदाहरण खनिज संसाधन, कोयला लौह अयस्क, इत्यादि।
उत्तर : पृथ्वी पर संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध है। इसका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए ताकि वर्तमान के साथ साथ अगली पीढ़ी भी इसका उपयोग कर सकें । संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है -
  • 1. वन हमारे पर्यावरण के महत्वपूर्ण अंग है। इसका संरक्षण नहीं किया गया तो वायु प्रदूषण के कारण मानव जीवन खतरे में पड़ जाएगा।
  • 2. भूमिगत जल का स्तर निरंतर उपयोग के कारण लगातार नीचे जा रहा है जिसका दुष्प्रभाव कृषि एवं अन्य क्षेत्रों में दिखाई पड़ने लगा है अतः जल का संरक्षण किसी भी कीमत पर होना चाहिए।
  • 3. आधुनिक जीवन में बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खनिज संसाधन का होना जरूरी है। खनिज संसाधन के बिना न तो उद्योग के लिए कच्चा माल उपलब्ध होगा न हीं उद्योग चलाने के लिए ऊर्जा की आपूर्ति हो सकेगी।
  • 4. जनसंख्या बढ़ने के कारण कृषि भूमि पर आवास निर्माण का दबाव बढ़ रहा है। अतः यह आवश्यक है कि भूमि का योजनाबद्ध उपयोग किया जाए।
उत्तर : संसाधनों का योजनबद्ध, विवेकपूर्ण तथा न्यायसंगत उपयोग को संसाधन नियोजन कहा जाता है। संसाधनों का नियोजन निम्नांकित दो कारणों से आवश्यक है - संसाधनों की मात्रा सीमित है और वितरण असमान है।
संसाधन नियोजन के विभिन्न स्तर -
  • 1. संसाधनों की पहचान उनका सूचीकरण एवं उनकी गुणात्मकता तथा मात्रात्मकता का अनुमान लगाना ।
  • II. उपयुक्त प्रौद्योगिकी कौशल तथा संस्थागत नियोजन ढांचा तैयार करना ।
  • III. संसाधन विकास योजनाओं तथा राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना।
  • प्राकृतिक संसाधन: प्रकृति द्वारा उपहार स्वरूप जो संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं, उन्हें प्राकृतिक संसाधन कहते हैं। जैसे - भूमि, जल, वनस्पति, खनिज आदि।
  • मानव निर्मित संसाधन: मनुष्य द्वारा निर्मित संसाधनों को मानव निर्मित संसाधन कहा जाता है। जैसे - बांध, मशीन, उद्योग, घर, सड़क आदि।
उत्तर : भारत में मुख्यतः 6 प्रकार की मिट्टी पाई जाती है:
  • जलोढ़ मिट्टी: नदी द्वारा लाए गए अवसादों से निर्मित, सबसे उपजाऊ। यह पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल में पाई जाती है।
  • काली मिट्टी: ज्वालामुखी बेसाल्ट चट्टानों से निर्मित, कपास के लिए उपयुक्त। इसे रेगुर मिट्टी भी कहते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश में फैली है।
  • लाल मिट्टी: लोहे के अंश के कारण लाल दिखाई देती है। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड में पाई जाती है।
  • लैटेराइट मिट्टी: उच्च तापमान एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में मिलती है। कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • रेगिस्तानी मिट्टी: कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है, बालू की मात्रा ज्यादा होती है। राजस्थान के पश्चिमी भाग में पाई जाती है।
  • वन मृदा: पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है, इनमें ह्यूमस की मात्रा अधिक होती है।
उत्तर : मृदा की उपजाऊ शक्ति का लगातार कम होना भूमि क्षरण कहलाता है। इसके प्रमुख कारण हैं:
  • भूमि अपरदन: जल, पवन तथा हिमनद द्वारा भूमि की ऊपरी परत का नष्ट होना।
  • भूमि प्रदूषण: उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित जल तथा कूड़ा कचरा।
  • पशुचारण तथा वनों की कटाई: अंधाधुंध कटाई से उसकी उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
  • उद्योग धंधे: चूना पत्थर की पिसाई और चिमनी की धूल से खेतों में जमा होना।
उत्तर : मृदा का ऊपरी परत हटना मृदा अपरदन कहलाता है। यह निम्नलिखित प्रकार से होता है:
  • मानवीय कारक: वनों की कटाई, अति पशु चारण, खनन कार्य और दोष पूर्ण कृषि पद्धति।
  • प्राकृतिक कारक: पवन, जल तथा हिमनद। बहते जल से भूमि पर अवनालिकाएं बनती हैं और पवन मिट्टी उड़ा ले जाती है।
उत्तर : मृदा की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
  • वृक्षारोपण और पेड़ों की रक्षक मेखला बनाना
  • पशु चारण और खनन नियंत्रण
  • ढाल वाली भूमि पर सीढ़ीनुमा खेती करना
  • औद्योगिक जल को परिष्करण के पश्चात ही विसर्जित करना।
  • सीढीनुमा कृषि पद्धति को अपनाना चाहिए।
  • खेत के चारों ओर घास या छोटे पौधे लगाने चाहिए ।
  • पहाड़ी भागों में पशुओं की चराई पर रोक लगाया जाना चाहिए।
  • पर्वतीय ढालों पर बांध बनाकर जल प्रवाह को रोकने का प्रयास करना चाहिए ।
उत्तर : स्वामित्व के आधार पर संसाधनों को चार भागों में बांटा गया है:
  • व्यक्तिगत संसाधन: निजी व्यक्तियों का स्वामित्व (जैसे - घर, तालाब, कुआं)।
  • सामुदायिक संसाधन: समुदाय के सभी लोग उपयोग कर सकते हैं (जैसे - पार्क, खेल का मैदान)।
  • राष्ट्रीय संसाधन: राष्ट्र (देश) का स्वामित्व (जैसे - सड़कें, नहरे, रेल लाइन)।
  • अंतर्राष्ट्रीय संसाधन: अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा नियंत्रित (जैसे - तट रेखा से 200 किमी बाद का समुद्री क्षेत्र)।
  • प्रौद्योगिकी के विकास के कारण संसाधनों का दोहन भारी पैमाने पर संभव हुआ जिससे अधिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ी।
  • संसाधन तब तक विकास का कारण नहीं बन सकते जब तक उन्हें उपयोग में लाने लायक कौशल का विकास न हो।
  • साम्राज्यवादी देशों ने उच्च प्रौद्योगिकी के बल पर भारत के संसाधनों का खूब दोहन किया, जिससे उनकी स्थिति सुदृढ़ हुई।