माता का आँचल

लेखक: शिवपूजन सहाय (उपन्यास अंश - Class 10th Hindi 'कृतिका')

🎭 कहानी के मुख्य आधार स्तंभ (Core Dimensions)

1. पिता का अनन्य सानिध्य (Father's Companion)

तारकेश्वरनाथ (भोलानाथ) का अधिकांश समय अपने पिता (बाबूजी) के साथ बीतता था। सुबह उठने, पूजा करने, रामनामा बही लिखने से लेकर गंगा में मछलियों को दाना खिलाने तक पिता उनके सारथी थे।

2. बाल-मंडली के खेल (Childhood Innocent Games)

गाँव की सादगी में बच्चे घर की बेकार वस्तुओं—मिट्टी के बर्तनों, पत्तों, ढेरों और धूल से दुकानदारी, खेती, बारात और भोज (दावत) जैसे अद्भुत नाटक रचते थे, जो बच्चों की कल्पनाशीलता को दर्शाता है।

3. माँ की ममता (Mother's Protective Abode)

पिता के साथ कितना भी गहरा लगाव हो, परंतु जब बच्चा किसी भयंकर संकट या डर (सांप के खौफ) में होता है, तो उसे परम शांति और सुरक्षा केवल माँ की छाती और उसके आँचल के भीतर ही मिलती है।
📖 पाठ का संपूर्ण सारांश (Complete Summary)
1. भोलानाथ का नामकरण और बाबूजी की दिनचर्या
लेखिका के इस अंश में मुख्य पात्र तारकेश्वरनाथ हैं, जिन्हें प्यार से सब **'भोलानाथ'** पुकारते थे। भोलानाथ के सिर पर लंबी-लंबी जटाएँ (बाल) थीं, जिससे बाबूजी जब उनके माथे पर भभूत (रामानंदी चंदन) लगा देते थे, तो वे साक्षात् 'बम-भोला' बन जाते थे। बाबूजी की दिनचर्या सुबह तड़के उठने से शुरू होती थी। वे स्नान करके पूजा पर बैठते, भोलानाथ को भी साथ बिठाते। पूजा के बाद वे अपनी 'रामनामा बही' पर हजार बार राम-नाम लिखते थे और फिर कागज़ की छोटी-छोटी गोटियों में लिपटी पाँच सौ राम-नाम की पर्चियों को लेकर गंगा जी की ओर चल देते थे। भोलानाथ उनके कंधे पर सवार रहते थे।
2. गंगा यात्रा और माँ का जबरदस्ती तोता-मैना खिलाना
गंगा जी में मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाकर जब बाबूजी घर लौटते, तो रास्ते में झुके हुए पेड़ों की डालियों पर भोलानाथ को बिठाकर झूला झुलाते थे। घर आकर बाबूजी उन्हें अपने हाथ से चौके (रसोई) में खाना खिलाते थे। परंतु माँ की ममता तृप्त नहीं होती थी; माँ कहती थी—"जब तक मरद (पुरुष) खिलाएगा, तब तक बच्चे का पेट नहीं भरेगा।"
माँ बड़े प्यार से थाली में दही-भात सानती और तोता, मैना, कबूतर, हंस आदि के बनावटी नाम लेकर कहती—"खालो, नहीं तो उड़ जाएंगे!" और भोलानाथ उड़ने से पहले ही उन कौरों को चट कर जाते थे। इसके बाद माँ उन्हें जबरदस्ती पकड़कर उनके सिर पर कड़वा तेल (सरसों का तेल) मल देती थी, जिससे वे रोने लगते थे।
3. देहाती बाल-मंडली के अनोखे खेल और नाटक
जैसे ही भोलानाथ रोते-धोते घर से बाहर निकलते, उन्हें अपने हमउम्र बच्चों की मंडली मिल जाती थी। बच्चों के खेल बहुत ही सस्ते और अद्भुत होते थे। वे चबूतरे के एक कोने को नाटकघर बनाते थे। बाबूजी की छोटी चौकी को रंगमंच बनाया जाता। घड़े के टुकड़े को बटलोई, धूल को आटा, गीली मिट्टी को कचौड़ी और पत्तों को पूरी बनाकर वे **'दुकानदारी'** का खेल खेलते थे। कभी-कभी वे **'घराती और बारात'** का नाटक रचते थे—टूटी टोकरी का पालकी बनाया जाता, मकई के पौधों को समधी बनाया जाता और लड़कियां दुल्हन बनती थीं। बाबूजी जब आकर मज़ाक में दुल्हन का घूंघट उठाते, तो सब बच्चे हँसकर भाग जाते थे।
4. चिड़ियों को पकड़ना और बुजुर्गों का मज़ाक (सनक)
एक बार रास्ते में चलते हुए बच्चों को मकई के खेत में चिड़ियों का झुंड चरते हुए दिखा। बच्चे उन्हें पकड़ने के लिए दौड़े और गाने लगे—"रामजी की चिरई, रामजी का खेत, खा लो चिरई, भर-भर पेट।" लेकिन चिड़ियाँ उड़ गईं।
आगे जाने पर आंधी आने के बाद जब आम के बाग में वे आम चुन रहे थे, तो वहां से एक बुजुर्ग **मूसन तिवारी** गुजर रहे थे। बच्चों की ढिठाई जाग उठी। बैजू नाम के एक शरारती लड़के ने मूसन तिवारी को चिढ़ाते हुए नारा लगाया—"बुढ़वा मंगल माँगे, परैला की चोख!" मूसन तिवारी ने पाठशाला (स्कूल) जाकर गुरुजी से शिकायत कर दी। गुरुजी ने सिपाहियों को भेजकर भोलानाथ को पकड़वा लिया। बाबूजी ने स्कूल जाकर गुरुजी की खुशामद की और भोलानाथ को रोते हुए घर लाए। रास्ते में मित्रों का दल मिलते ही भोलानाथ रोना भूलकर फिर खेल में मस्त हो गए।
5. टीले पर चूहे का बिल और सांप का भयानक खौफ
कहानी का सबसे रोमांचक और रीढ़ कँपा देने वाला मोड़ तब आता है जब बच्चे एक टीले पर जाकर चूहों के बिल में पानी डालने लगते हैं। नीचे से पानी ऊपर डालते-डालते सब थक गए। अचानक उस बिल में से चूहे की जगह **एक भयानक सांप** बाहर निकल आया। सांप को देखते ही बच्चे अपनी सुध-बुध खोकर बेतहाशा भागे। कोई औंधे मुंह गिरा, किसी के दांत टूटे, किसी का सिर फूटा। सब के पैर काँटों से छलनी हो गए। भोलानाथ भी लहूलुहान पैरों से भागते हुए सीधे अपने घर के भीतर घुसे।
6. क्लाइमेक्स: पिता की पुकार और माँ का आँचल
उस समय बाबूजी बैठक के बरामदे में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। उन्होंने चिल्लाकर आवाज दी—"भोलानाथ! भोलानाथ!" परंतु भोलानाथ बाबूजी के पास नहीं रुके। वे सीधे दौड़कर घर के भीतर अपनी माँ के पास गए और उनकी गोदी में छिप गए। माँ उस समय चावल साफ कर रही थी। बच्चे को इस तरह थर-थर कांपते, हांफते और रोते देखकर माँ बहुत घबरा गई। उसने अपने सारे काम छोड़ दिए और रोते हुए भोलानाथ को अपनी छाती से कसकर चिपका लिया।
बाबूजी भी दौड़कर अंदर आए और कहा—"लाओ, इसे मुझे दे दो।" परंतु भोलानाथ ने बाबूजी की गोद में जाने से साफ मना कर दिया। वे माँ के आँचल की उस कोमल, सुरक्षित और प्रेममयी छाया से बाहर नहीं निकलना चाहते थे। इसी मर्मस्पर्शी दृश्य के साथ कहानी समाप्त होती है।

💡 पाठ का मूल संदेश / उद्देश्य (Theme & Message)

"पिता का लाड़-प्यार जीवन की धूप है, परंतु माँ का आँचल संकट की छाँव है।"
शिवपूजन सहाय जी का यह आंचलिक उपन्यास अंश हमें बीसवीं सदी के ग्रामीण भारत की अद्भुत सादगी और निश्छल बाल-मनोविज्ञान से परिचित कराता है। यह पाठ सिद्ध करता है कि एक बच्चे का अपने पिता से कितना भी गहरा और आत्मीय संबंध क्यों न हो, परंतु विपत्ति और भयंकर डर के समय जो असीम सुरक्षा, शांति और ममता माँ के आँचल के भीतर मिलती है, वह संसार के किसी अन्य कोने में नहीं मिल सकती। माँ का प्रेम निस्वार्थ और अनन्य है।

📝 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Important Subjective Questions)
प्रश्न 1: भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना (रोना) क्यों भूल जाता था? बाल-मनोविज्ञान के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर: बाल-मनोविज्ञान की यह बहुत बड़ी विशेषता होती है कि बच्चों को अपनी उम्र के साथियों (मित्रों) की टोली सबसे प्रिय लगती है। भोलानाथ जब पाठशाला की डांट या किसी बात से रोते हुए बाबूजी के साथ आ रहे होते थे, तो रास्ते में अपनी बाल-मंडली को नए-नए अनोखे खेल खेलते और हुल्लड़ मचाते देखते ही उनका ध्यान पूरी तरह दुःख से हट जाता था। साथियों के साथ खेलने का आनंद और उनका आकर्षण इतना तीव्र होता था कि वे अपना सारा दर्द और सिसकना पल भर में भूलकर दोबारा खेल में लग जाते थे।
प्रश्न 2: "माता का आँचल" पाठ में आए किन्हीं दो ऐसे प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने आपके दिल को गहराई से छू लिया हो।
उत्तर: इस पाठ के दो सबसे मर्मस्पर्शी प्रसंग निम्नलिखित हैं:
1. माँ का जबरदस्ती भोजन कराना: जब माँ कहती है कि पुरुषों के खिलाने से बच्चे का पेट नहीं भरता और वह थाली में तोता-मैना के नाम के काल्पनिक कौर बनाकर भोलानाथ को लाड़ से खिलाती है, वह दृश्य माँ के अनन्य वात्सल्य को दिखाता है।
2. सांप के डर से माँ की गोदी में छिपना (अंत): जब भोलानाथ सांप के डर से लहूलुहान होकर आते हैं और बाबूजी की पुकार को अनदेखा करके सीधे माँ के आँचल में छिप जाते हैं और माँ घबराकर रोने लगती है, यह प्रसंग आँसू ला देता है।
प्रश्न 3: भोलानाथ और उनके साथियों के खेल की सामग्रियां आज के आधुनिक बच्चों के खेल की सामग्रियों से किस प्रकार भिन्न हैं? विस्तृत तुलना करें। (VVI)
उत्तर: समय के बदलने के साथ बच्चों के खेल और उनकी सामग्रियों में एक बहुत बड़ा और चिंताजनक अंतर आ गया है, जिसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
1. भोलानाथ के दौर की सामग्रियां (प्राकृतिक और सामूहिक): भोलानाथ के समय खेल की सामग्रियां पूरी तरह प्रकृति और घर की बेकार वस्तुओं से जुड़ी थीं। धूल, मिट्टी के ढेले, पेड़ों के पत्ते, टूटे घड़े के टुकड़े, दियासलाई की डिब्बियाँ और पुरानी टोकरी ही उनके खिलौने थे। इन खेलों में एक रुपया भी खर्च नहीं होता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि ये खेल सामूहिक (Group) होते थे, जिससे बच्चों में सामाजिकता, आपसी भाईचारा, नेतृत्व और कल्पनाशीलता का अद्भुत विकास होता था।
2. आज के आधुनिक बच्चों की सामग्रियां (कृत्रिम और एकाकी): आज के बच्चों के खेल पूरी तरह महंगे गैजेट्स, प्लास्टिक के खिलौनों, वीडियो गेम्स, मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन (जैसे फ्री फायर, बीजीएमआई) पर सिमट गए हैं। इन सामग्रियों के लिए भारी धन खर्च होता है।
परिणाम: आज के खेल बच्चों को एकाकी (अकेला) बना रहे हैं। वे घर के कमरों में बंद रहते हैं, जिससे उनका शारीरिक विकास रुक रहा है, आँखें कमजोर हो रही हैं और वे सामाजिक रूप से कटते जा रहे हैं। भोलानाथ के खेल जीवन के यथार्थ से जुड़े थे, जबकि आज के खेल आभासी (Virtual) दुनिया के भ्रम हैं।
प्रश्न 4: "माता का आँचल" शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। कहानी के अंत में भोलानाथ ने पिता के स्थान पर माँ का आश्रय क्यों चुना? (VVI / Board Important)
उत्तर: इस पाठ का शीर्षक 'माता का आँचल' पूर्णतः सार्थक, उद्देश्यपूर्ण और कहानी की आत्मा को व्यक्त करने वाला है। कहानी के अंत में भोलानाथ द्वारा माँ को चुनना निम्नलिखित मनोवैज्ञानिक सत्यों को प्रमाणित करता है:
1. शीर्षक की सार्थकता: पूरी कहानी में यद्यपि 90% भाग में भोलानाथ का अपने पिता के साथ घूमना, पूजा करना और खेलना दिखाया गया है। ऐसा लगता है कि पिता ही उनके सर्वस्व हैं। परंतु कहानी का अंत जिस मोड़ पर होता है, वह पूरे पाठ का दृष्टिकोण बदल देता है। संकट के समय माँ का आँचल ही रक्षक बनता है, इसलिए यह शीर्षक सबसे उत्तम है।
2. माँ का आश्रय चुनने का कारण: जब बच्चे पर साक्षात् मौत (सांड़ या सांप का भयानक डर) का संकट आया, तो उसका सारा बाहरी कौतुक समाप्त हो गया। पिता के साथ उसका संबंध स्नेह और सखा (मित्र) जैसा था, जहाँ वह खेलता और हँसता था। परंतु माँ के साथ उसका संबंध **'गर्भ' और 'उत्पत्ति'** का है, जहाँ उसे पूर्ण सुरक्षा की जैविक और आत्मिक गारंटी मिलती है।
माँ के आँचल में छिपाकर उसे जो शांति मिली, वह पिता के बरामदे में नहीं मिल सकती थी। माँ का रोना और बच्चे के दुःख से तड़प उठना यह दिखाता है कि बच्चे की सुरक्षा के लिए माँ अपनी जान भी दे सकती है। इसी अगाध और निस्वार्थ शरण की खोज में भोलानाथ ने पिता को छोड़कर माँ की छाती को चुना।
प्रश्न 5: "माता का आँचल" नामक इस अत्यंत प्रसिद्ध, आंचलिक और बाल-मनोविज्ञान पर आधारित पाठ के मूल रचनाकार कौन हैं? (Objective MCQ)
क) फणीश्वरनाथ रेणु
ख) मुंशी प्रेमचंद
ग) शिवपूजन सहाय
घ) जगदीश चंद्र माथुर
उत्तर: ग) शिवपूजन सहाय
Created for Merit Yard Pandwa Students | Best of Luck 🎓
🗣️ Class 10th Hindi (कृतिका): माता का आँचल (Objective Questions)
भोलानाथ जैसी निष्पाप एकाग्रता रखें, और परीक्षा के सारे डरों (सांप) को अपनी मेहनत से भगाएं! 🌾🎯
भोलानाथ ने बचपन की सादगी में हर परिस्थिति का आनंद लिया, परंतु संकट आने पर सही आश्रय (माँ का आँचल) चुना। आपके बोर्ड एग्जाम्स भी आपके ज्ञान और एकाग्रता की परीक्षा हैं! परीक्षा के डर रूपी सांप से घबराना नहीं है; बल्कि अपनी नियम-निष्ठा (बाबूजी की रामनामा बही जैसी नियमित पढ़ाई) को अपना मजबूत हथियार बनाना है। भ्रमित करने वाले विकल्पों को हराकर अपनी बुद्धिमत्ता का जादू बिखेरिए, और अभी इन महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (MCQs) की प्रैक्टिस करके पूरे अंक पक्के कीजिए!

👉 वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की प्रैक्टिस करें (Link Here)
(जिस तरह माँ के कोमल और स्नेहमयी आँचल ने भोलानाथ के सारे कंपकंपी और डर को पल भर में शांत कर दिया, उसी तरह आपकी बेहतरीन, सटीक और अनुशासित तैयारी परीक्षा के हॉल में आपके आत्मविश्वास को सबसे ऊँचा रखेगी। दिखावे से दूर रहें, अपनी वास्तविक पढ़ाई को अपनी रीढ़ बनाइये, और अभी इस बेहतरीन क्विज टेस्ट को अटेंप्ट करके पूरे 100% अंक हासिल कीजिए!)