जाति, धर्म और लैंगिक मसले

Class 10th Civics - JAC Board Important Subjective Notes

Most Important Subjective Questions
उत्तर: श्रम के लैंगिक विभाजन का अर्थ काम के उस बँटवारे से है जिसमें घर के अंदर के सारे काम (जैसे- खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना और बच्चों की देखभाल करना) परिवार की महिलाएँ करती हैं या अपनी देखरेख में घरेलू नौकरों से कराती हैं। वहीं पुरुषों के बारे में यह माना जाता है कि वे घर के बाहर का काम करेंगे और धन कमाएंगे। यह विभाजन जैविक बनावट पर आधारित नहीं है, बल्कि सामाजिक उम्मीदों और रूढ़ियों पर आधारित है। लैंगिक विभाजन के कारण ही सार्वजनिक जीवन में, विशेषकर राजनीति में, महिलाओं की भूमिका काफी कम रह गई है।
उत्तर: नारीवादी आंदोलन उन आंदोलनों को कहा जाता है जिनका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार और अवसर दिलाना है। ये आंदोलन औरतों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की मांग करते हैं। नारीवादी आंदोलनों की मुख्य मांगें: 1. महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार, विशेषकर मतदान का अधिकार दिया जाए। 2. महिलाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जाए। 3. औरतों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी सुनिश्चित की जाए। 4. सार्वजनिक जीवन में और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए।
उत्तर: जब राजनीति में धर्म का उपयोग इस तरह किया जाए कि एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों के विरुद्ध खड़े हो जाएँ और अपने धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ मानने लगें, तो इसे साम्प्रदायिकता कहते हैं। राजनीति में साम्प्रदायिकता के रूप: 1. दैनिक विचार: साम्प्रदायिकता का सबसे आम रूप हमारे दैनिक विश्वासों में दिखता है, जहाँ हम अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरों के धर्म को कमतर मानने लगते हैं। 2. राजनीतिक गोलबंदी: चुनाव के समय राजनीतिक दल धर्म के आधार पर मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश करते हैं। पवित्र प्रतीकों और धर्मगुरुओं का उपयोग किया जाता है। 3. प्रभुत्व की इच्छा: बहुसंख्यक समुदाय के लोग शासन पर पूर्ण प्रभुत्व जमाने का प्रयास करते हैं, जबकि अल्पसंख्यक समुदाय अलग राजनीतिक इकाई की मांग करने लगते हैं। 4. साम्प्रदायिक हिंसा: साम्प्रदायिकता का सबसे भयानक रूप साम्प्रदायिक दंगे, हिंसा और नरसंहार है (जैसे- विभाजन के समय हुए दंगे)।
उत्तर: धर्मनिरपेक्ष राज्य वह होता है जिसका अपना कोई आधिकारिक धर्म नहीं होता और जो सभी धर्मों को समान महत्व देता है। भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष प्रावधान: 1. भारतीय राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है (जैसे श्रीलंका में बौद्ध धर्म या पाकिस्तान में इस्लाम है)। 2. संविधान सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की आजादी देता है। 3. संविधान धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकता है। 4. साथ ही, संविधान धार्मिक समुदायों में समानता सुनिश्चित करने के लिए शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार देता है (जैसे- छुआछूत पर रोक)।
उत्तर: भारत में जाति और राजनीति का गहरा संबंध है। राजनीति में जाति निम्नलिखित रूप ले सकती है: 1. उम्मीदवारों का चयन: चुनाव के समय राजनीतिक दल उम्मीदवार तय करते समय उस क्षेत्र की जातीय संरचना का ध्यान रखते हैं ताकि उन्हें उस जाति का समर्थन मिल सके। 2. जातीय भावनाओं को भड़काना: राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए जातीय भावनाओं को उकसाते हैं और खुद को किसी विशेष जाति का मददगार बताते हैं। 3. मंत्रिमंडल का गठन: सरकार बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों को मंत्रिमंडल में जगह मिले। 4. जातीय गोलबंदी: 'वोट बैंक' की राजनीति के कारण जातियों के अंदर यह चेतना आई है कि वे एकजुट होकर सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांगें।
उत्तर: यह कहना गलत होगा कि चुनाव सिर्फ जाति पर आधारित होते हैं, इसके निम्नलिखित कारण हैं: 1. किसी भी संसदीय क्षेत्र में एक जाति के मतदाताओं का स्पष्ट बहुमत नहीं होता। इसलिए उम्मीदवार को जीतने के लिए एक से अधिक जातियों का भरोसा जीतना पड़ता है। 2. कोई भी दल एक जाति के सभी वोट प्राप्त नहीं कर सकता। एक ही जाति के अंदर भी वैचारिक मतभेद होते हैं। 3. अक्सर एक ही जाति के कई उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते हैं, जिससे उस जाति के वोट बँट जाते हैं। 4. चुनाव में सत्तारूढ़ दल की परफॉरमेंस और नेताओं की लोकप्रियता भी अहम भूमिका निभाती है, न कि केवल जाति।
उत्तर: भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अभी भी बहुत कम और चिंताजनक है: 1. भारत की लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या कभी भी कुल संख्या के 15 प्रतिशत तक भी नहीं पहुँच पाई है। 2. राज्य विधानसभाओं में उनकी स्थिति और भी खराब है, जहाँ महिला प्रतिनिधित्व 5 प्रतिशत से भी कम है। 3. भारत इस मामले में दुनिया के कई विकसित देशों और यहाँ तक कि अफ्रीका के कई देशों से भी पीछे है। 4. हालांकि, स्थानीय निकायों (पंचायतों और नगरपालिकाओं) में एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं, जिससे लगभग 10 लाख महिला प्रतिनिधि चुनकर आ रही हैं।
उत्तर: जातिवाद के भारतीय लोकतंत्र पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़े हैं: सकारात्मक प्रभाव: 1. निचली जातियों के लोगों को अपनी बात रखने और सत्ता में हिस्सेदारी माँगने का मंच मिला है। 2. जातीय गोलबंदी के कारण दलित और पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना आई है। नकारात्मक प्रभाव: 1. यह गरीबी, विकास और भ्रष्टाचार जैसे असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाता है। 2. इससे समाज में आपसी तनाव और टकराव बढ़ता है। 3. यह देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा करता है।
उत्तर: सांप्रदायिक राजनीति का सबसे बुरा परिणाम भारत का विभाजन था: 1. औपनिवेशिक शासन के दौरान 'बाँटो और राज करो' की नीति ने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास पैदा किया। 2. मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे संगठनों ने धर्म के आधार पर राजनीति की। 3. 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) ने यह तर्क दिया कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं और वे एक साथ नहीं रह सकते। 4. इसके परिणामस्वरूप 1947 में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगे हुए और लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और विस्थापित होना पड़ा।
उत्तर: पारिवारिक कानून उन कानूनों को कहते हैं जो विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे परिवार से जुड़े मसलों को नियंत्रित करते हैं। हमारे देश में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पारिवारिक कानून हैं (जैसे- हिंदू लॉ, मुस्लिम पर्सनल लॉ)। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि ये कानून महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण हैं। इसी कारण देश में 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) की मांग की जाती है ताकि सभी धर्मों की महिलाओं को समान अधिकार मिल सकें।