इस जल प्रलय में

लेखक: फणीश्वरनाथ रेणु (रिपोर्ताज - Class 9th Hindi 'कृतिका')

🎭 बाढ़ की विभीषिका के मुख्य बिंदु (Core Highlights of the Devastation)

1. लेखक का क्षेत्र (Writer's Background)

रेणु जी का गाँव ऐसे क्षेत्र में था जहाँ कोसी, पनार, महानंदा और गंगा की बाढ़ से पीड़ित लोग पनाह लेते थे। वे तैरना नहीं जानते थे, लेकिन बाढ़ पर लिखने और रिलीफ वर्क का गहरा अनुभव था।

2. पटना का खौफ (1967 Flood Reality)

सन् 1967 में जब पुनपुन का पानी पटना के राजेंद्रनगर, कंकड़बाग और अन्य इलाकों में घुसा, तो पूरा शहर एक तैरते हुए मलबे और दहशत के साए में तब्दील हो गया था।

3. मानवीय मानसिकता (Human Psychology)

आपदा के समय जहाँ कुछ लोग आवश्यक सामग्री (दीयासलाई, मोमबत्ती, आलू, दवा) जुटाने में लगे थे, वहीं कुछ लोग कॉफी हाउस और ताश की बाज़ी में मशगूल होकर विलासिता का प्रदर्शन कर रहे थे।
📖 पाठ का संपूर्ण सारांश (Complete Summary)
1. लेखक का परिचय और बाढ़ का अनुभव
लेखक फणीश्वरनाथ रेणु जी बताते हैं कि उनका जन्म एक ऐसे ग्रामीण क्षेत्र में हुआ था जहाँ हर साल कोसी, पनार, महानंदा और गंगा की विनाशकारी बाढ़ से त्रस्त हजारों लोग शरण लेते थे। लेखक तैरना नहीं जानते थे, परंतु दस वर्ष की उम्र से ही वे स्काउट, स्वयंसेवक और रिलीफ वर्कर के रूप में बाढ़ पीड़ितों की सेवा कर रहे थे। उन्होंने बाढ़ पर कई रिपोर्ताज और कहानियाँ भी लिखी थीं। परंतु, बाढ़ को भुगतने का उनका पहला वास्तविक शहरी अनुभव सन् 1967 में हुआ, जब वे पटना के राजेंद्रनगर इलाके में रह रहे थे।
2. पटना में बाढ़ का आगमन और अफवाहें
सन् 1967 में लगातार अठारह घंटे की भारी बारिश के कारण पुनपुन और गंगा का पानी पटना शहर में घुसने लगा। दोपहर में सूचना मिली कि 'गोलघर' पानी से घिर गया है। लेखक अपने एक बुद्धिजीवी मित्र के साथ बाढ़ का हाल देखने 'कॉफी हाउस' के लिए निकले। कॉफी हाउस बंद हो चुका था और सड़क पर पानी तेजी से आगे बढ़ रहा था, जो झाग और फेन से भरा हुआ था। लेखक ने पानी की इस डरावनी गति को देखकर कहा—"यह मृत्यु का तरल दूत है।" लोग अपने वाहनों और पीठ पर सामान लादकर सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे थे।
3. राजेंद्रनगर का दृश्य और लोगों की तैयारी
राजेंद्रनगर चौराहे पर 'मैगजीन कॉर्नर' के पास पत्र-पत्रिकाएँ बिखरी पड़ी थीं। लोग घबराने के बजाय कॉमिक्स और किताबें खरीद रहे थे ताकि कैद के दिनों में समय काटा जा सके। घरों के नीचे की दुकानों से सामान तेजी से हटाया जा रहा था। लोग राशन, केरोसिन, मोमबत्तियां, दीयासलाई, आलू और कंपोज (नींद की दवा) इकट्ठा करने में लगे थे। लाउडस्पीकर से लगातार घोषणा की जा रही थी कि "भाइयो! बाढ़ का पानी आज रात के बारह-एक बजे तक हमारे इलाके में घुस सकता है, इसलिए आप सब सजग रहें।" पूरे राजेंद्रनगर में सन्नाटा था, लेकिन छत के ऊपर लोग जाग रहे थे।
4. पुरानी यादें: भादवा और मनहारी की बाढ़
रात के समय जब लेखक को नींद नहीं आ रही थी, तो उनके दिमाग में बाढ़ की पुरानी यादें तैरने लगीं। उन्हें सन् 1947 की याद आई जब वे गुरुजी (सतीनाथ भादुड़ी) के साथ कटिहार जिले की बाढ़ में नाव पर दवा, केरोसिन तेल और दीयासलाई लेकर गए थे। वहां एक बीमार युवक अपने साथ अपने कुत्ते को भी नाव पर ले जाना चाहता था; जब गुरुजी ने मना किया तो कुत्ता और युवक दोनों ही पानी में कूद गए। रेणु जी को सन् 1949 की 'बलुआ' बाढ़ की भी याद आई जब मुसहरों की बस्ती में लोग राहत सामग्री के बजाय नाच-गाने और नाटक (कीर्तन) का प्रबंध करके अपने गम को भुला रहे थे।
5. जनसंपर्क की गाड़ी और कलाई घड़ी का सस्पेंस
रात के ढाई बज चुके थे। लेखक बार-बार उठकर अपनी कलाई घड़ी देखते हैं। पानी अभी तक राजेंद्रनगर के पार्क तक नहीं पहुँचा था। सुबह के साढ़े पांच बजे जब कलाई घड़ी में सुइयाँ आगे बढ़ीं, तो अचानक लेखक को नींद से जगाया गया। बाहर शोर था—"आ गया! पानी आ गया!" लेखक ने खिड़की से देखा कि पश्चिम की दिशा से झाग उगलते हुए पानी का एक विशाल सैलाब तेजी से बढ़ रहा था। पार्क डूब चुका था, राजेंद्रनगर चौराहे का मैगजीन कॉर्नर डूब गया था। पानी की लहरों पर बिजली के खंभे और पेड़ तैरते हुए महसूस हो रहे थे।
6. निष्कर्ष: कैमरामैन और टेप रिकॉर्डर की इच्छा
बाढ़ का पानी लेखक के घर की पहली मंजिल की सीढ़ियों तक पहुँच गया था। चारों तरफ पानी ही पानी था। लेखक सोचते हैं कि इस समय यदि उनके पास एक मूवी कैमरा, एक टेप रिकॉर्डर या कम से कम एक कलम होती, तो वे इस खौफनाक दृश्य को पूरी तरह रिकॉर्ड कर लेते। लेकिन तुरंत ही वे अपने विचार बदलते हैं कि अच्छा है कि उनके पास इस समय कुछ भी नहीं है। यदि कैमरा होता तो वे केवल एक दर्शक बन जाते; कलम और कागज़ न होने से वे इस त्रासदी को अपने दिल की गहराइयों में महसूस कर रहे थे। पाठ का अंत अत्यंत सस्पेंस और उफनते पानी के सजीव चित्रण के साथ होता है।

💡 पाठ का मूल संदेश / उद्देश्य (Theme & Message)

"प्राकृतिक आपदाओं के समय धैर्य, मानवीय एकता और सजगता ही सबसे बड़ा सहारा है।"
फणीश्वरनाथ रेणु जी ने इस रिपोर्ताज के माध्यम से बाढ़ की विभीषिका का अत्यंत यथार्थ और रीढ़ की हड्डी कँपा देने वाला जीवंत वर्णन किया है। यह पाठ हमें सिखाता है कि संकट के समय हमें अफवाहों से बचना चाहिए और आवश्यक वस्तुओं का सही प्रबंधन करना चाहिए। साथ ही, पशु-प्रेम और ग्रामीण लोक-संस्कृति के प्रसंगों से यह सिद्ध होता है कि कठिन से कठिन समय में भी आत्मीयता और कला ही मनुष्य को जिंदा रखती है।

📝 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Important Subjective Questions)
प्रश्न 1: बाज़ारू सड़कों पर पानी की डरावनी गति को देखकर लेखक ने उसे "मृत्यु का तरल दूत" क्यों कहा है?
उत्तर: लेखक ने बाढ़ के पानी को 'मृत्यु का तरल दूत' इसलिए कहा है क्योंकि वह पानी शांत या सामान्य नहीं था। वह झाग और फेन से भरा हुआ था और अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ रहा था, जो अपने रास्ते में आने वाली हर वस्तु (दुकानें, गाड़ियाँ, मकान) को डुबाने और नष्ट करने पर आमादा था। वह पानी साक्षात् काल (मृत्यु) की तरह बढ़ रहा था, जिसके आने का सीधा अर्थ भारी तबाही और जान-माल का नुकसान था।
प्रश्न 2: आपदाओं से निपटने के लिए राजेंद्रनगर के लोगों ने किस प्रकार की तैयारियाँ की थीं? सूची बनाइए।
उत्तर: राजेंद्रनगर के लोगों ने लाउडस्पीकर की घोषणा सुनकर निम्नलिखित तैयारियाँ की थीं:
1. दुकानों के नीचे के हिस्सों से कीमती सामान और अनाज को ऊपरी मंजिलों पर पहुँचाया गया।
2. दैनिक और संकटकालीन उपयोग के लिए केरोसिन तेल, मोमबत्तियां, दीयासलाई और आलू का स्टॉक कर लिया गया।
3. पीने का पानी इकट्ठा किया गया और संकट के समय घबराहट दूर करने के लिए कंपोज (नींद की दवा) का प्रबंध किया गया।
4. समय काटने के लिए मैगजीन कॉर्नर से कॉमिक्स और किताबें खरीदी गईं।
प्रश्न 3: लेखक सन् 1949 की 'बलुआ' की बाढ़ और मुसहरों की बस्ती के किस प्रसंग को याद करते हैं? उससे मानव स्वभाव की क्या विशेषता प्रकट होती है? (VVI)
उत्तर: लेखक सन् 1949 की बाढ़ को याद करते हुए एक अत्यंत रोचक और गहरा प्रसंग बताते हैं:
1. जब वे रिलीफ टीम के साथ मुसहरों (एक अत्यंत गरीब पिछड़ी जाति) की बस्ती में नाव लेकर पहुँचे, तो वहां लोग भूख से बेहाल थे। लेकिन राहत सामग्री के रूप में अन्न या कपड़ा मांगने के बजाय उन्होंने कहा कि "हमें दवा या अनाज नहीं चाहिए, यदि नाच-गाना देखने की व्यवस्था हो सके तो कीजिए।"
2. मुसहरों ने नाव पर ही एक मचान (स्टेज) बनाया और धान की कटाई का एक पारंपरिक लोक-नाटक (सवांग) शुरू किया। एक नट 'धनीराम' का स्वांग कर रहा था और उसकी नटिन उसकी हरकतों पर रो-रोकर अभिनय कर रही थी।
विशेषता: यह प्रसंग मानव स्वभाव की अद्भुत विशेषता दिखाता है कि मनुष्य संकट और अत्यधिक गरीबी की स्थिति में भी कला, संगीत और अपनी लोक-संस्कृति के बल पर मानसिक तनाव और मौत के डर को जीत सकता है। कला ही जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
प्रश्न 4: "इस जल प्रलय में" रिपोर्ताज के अंत में लेखक के पास मूवी कैमरा या कलम न होने पर उनके विचारों में क्या बदलाव आया? विस्तृत व्याख्या करें। (VVI / Board Important)
उत्तर: पाठ के अंत में जब पानी लेखक की सीढ़ियों तक पहुँच जाता है, तो उनके मन में एक गहरा वैचारिक अंतर्द्वंद्व चलता है:
1. शुरुआती इच्छा: लेखक सोचते हैं कि यदि इस समय उनके पास एक मूवी कैमरा या टेप रिकॉर्डर होता, तो वे बाढ़ की इस डरावनी और ऐतिहासिक विभीषिका को पूरी तरह रिकॉर्ड कर लेते, जो आगे काम आती। यदि कुछ नहीं तो कम से कम एक कलम और कागज़ ही होता तो वे अपनी भावनाओं को लिख लेते।
2. विचारों में बदलाव (परिवर्तन): लेकिन तुरंत ही लेखक का कलाकार मन बदल जाता है। वे सोचते हैं कि अच्छा ही है जो मेरे पास इस समय न कैमरा है, न टेप रिकॉर्डर है और न ही कलम है।
गहरी व्याख्या: लेखक का मानना था कि यदि उनके पास कैमरा होता, तो वे एक संवेदनशील इंसान के बजाय केवल एक 'पेशेवर दर्शक' बन जाते जो लेंस के पीछे से दूसरों के दुःख को देखता। कलम न होने के कारण वे इस भयंकर आपदा को किसी बाहरी उपकरण के बिना, स्वयं अपने अस्तित्व और अंतरात्मा की गहराइयों में पूरी तरह महसूस कर पा रहे थे। सादगी से दुःख को जीना ही सच्ची मानवीय संवेदना है।
.
प्रश्न 5: "इस जल प्रलय में" नामक इस कालजई और जीवंत आँखों देखे रिपोर्ताज के मूल लेखक कौन हैं? (Objective MCQ)
क) मुंशी प्रेमचंद
ख) हरिशंकर परसाई
ग) फणीश्वरनाथ रेणु
घ) राहुल सांकृत्यायन
उत्तर: ग) फणीश्वरनाथ रेणु
Created for Merit Yard Pandwa Students | Best of Luck 🎓
🗣️ Class 9th Hindi (कृतिका): इस जल प्रलय में (Objective Questions)
मुश्किलों की बाढ़ को पार करके बोर्ड एग्जाम्स में सफलता का परचम लहराएं! 🌊🎯
लेखक फणीश्वरनाथ रेणु जी ने पटना की भयानक बाढ़ का डटकर सामना किया और अपनी यादों व सूझबूझ से संकट को पार किया। आपके बोर्ड एग्जाम्स भी आपकी तैयारियों की परीक्षा हैं! कठिन और घुमावदार ऑब्जेक्टिव सवालों के 'तरल दूत' से घबराना नहीं है। राजेंद्रनगर के नागरिकों जैसी सजगता और हीरा-मोती जैसी एकाग्रता को अपना हथियार बनाएं, और अभी इन महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (MCQs) को सॉल्व करें!

👉 वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की प्रैक्टिस करें (Link Here)
(जिस तरह लेखक ने कैमरा और कलम न होने के बावजूद आपदा की हर बारीक हलचल को अपने मस्तिष्क में सहेज लिया, उसी तरह आपको भी अपने सिलेबस के हर बारीक कॉन्सेप्ट को दिमाग में बिठाना होगा। आलस्य का परित्याग कीजिए, अपनी एकाग्रता को उफनती लहरों से भी तेज बनाइये, और अभी इस बेहतरीन क्विज टेस्ट को अटेंप्ट करके 100% अंक हासिल कीजिए!)